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#हिंदीहैंहम: शहर के युवाओं के लिए हिंदी है उनकी आन, बान और शान 

Mon, 31 Aug 2020 03:21 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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सागर में मिलती धाराएं, हिंदी सबकी संगम है। शब्द, नाद, लिपि से भी आगे एक भरोसा अनुपम है। गंगा कावेरी की धारा साथ मिलाती हिंदी है। पूरब पश्चिम कमल पंखुड़ी सेतु बनाती हिंदी है...। शहर के युवाओं के लिए हिंदी उनकी आन और शान है। अपनी मातृभाषा के लिए उनके दिलों में सम्मान है। 

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समृद्ध बनाती है हिंदी
इंसान की कल्पनाशक्ति का विकास मातृभाषा में ही हो सकता है। सच्चाई यही है कि अंग्रेजी की तुलना में हिंदी इंसान को ज्यादा समृद्ध बना सकती है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। हमें दूसरों की भाषा सीखने का मौका मिले यह अच्छी बात है, लेकिन दूसरों की भाषा के चलते हमें अपनी मातृभाषा को छोड़ना पड़े तो यह सही नहीं। हमने अंग्रेजी को हिंदी में इतना ज्यादा मिला दिया है कि शुद्ध हिंदी लिखना ही भूल गए हैं। - अविनाश जायसवाल, छात्र

 
अभिव्यक्ति का साधन है हिंदी
हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का साधन भी है। हमारी सहजता, हमारा अधिकार जब किसी भाषा पर होता है, तब हम उस भाषा के माध्यम से जो भी व्यक्त करते हैं, वह हमें आलोकित करता है। हिंदी के साथ सहजता और अधिकार का संबंध बहुत व्यापक है। जब हम अपने शब्दों अपने विचारों को किसी के समक्ष रखते हैं, तो हमें ही नहीं बल्कि हमारे द्वारा बोले गए विचारों को भी लोग बहुत सहजता से स्वीकार करते हैं और यही स्वीकार्यता हमें हिंदी भाषी होने का गर्व महसूस कराती है। - रंजना कुमारी गुप्ता, शोध छात्रा, हिंदी विभाग, बीएचयू।

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राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी ने बनाई पहचान
हिंदी की खास बात यह है कि इसमें जिस शब्द को जिस प्रकार उच्चारित किया जाता है। उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है। हिंदी भाषा ही हमारे सामाजिक जीवन की नींव है। भाषा हमारी उन्नति और विकास का प्रतीक है।  हिंदी भाषा ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना अस्तित्व स्थापित किया है। - अश्विनी जायसवाल, छात्र     

हिंदी हमारी संस्कृति और पहचान
एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारी जीवन मूल्यों संस्कृति की परिचायक भी है। हिंदी अनुवाद की नहीं बल्कि संवाद की भाषा है। किसी भी भाषा की तरह हिंदी भी मौलिक सोच की भाषा है। हमारी संस्था होप वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों और महिलाओं को हिंदी भाषा के प्रति जागरूक किया जाता है। ग्रीन ग्रुप की 800 महिलाएं हिंदी परिभाषित गांवों से आती है और हिंदी को बढ़ावा देने का अभियान भी चलाती हैं। - दिव्यांशु उपाध्याय, सचिव, होप वेलफेयर ट्रस्ट
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