गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाने के लिए मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे बलिया जिले में पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से शौचालय की धनराशि का गोलमाल उजागर हुआ है।
अधिकांश गांवों में बगैर लाभार्थियों के चयन के ही धनराशि का आहरण कर लिया गया है। बलिया जिले में वर्ष 2014-15 में नमामि गंगे योजना की शुरुआत की गई। योजना के तहत गंगा किनारे के गांवों को शौचालय से संतृप्त किया जाना था।
शासन के निर्देश पर योजना के तहत गंगा किनारे के चार ब्लाकों के 41 गांवों का चयन किया गया। अधिकारियों ने सर्वे कर 41 गांवों को संतृप्त करने के लिए कुल 28 हजार शौचालय के लिए धनराशि की मांग की। वर्ष 2014-15 में पंचायती राज विभाग की ओर से चार हजार 552 शौचालय के लिए प्रति शौचालय चार हजार 600 की धनराशि उपलब्ध कराया गया।
प्रावधान यह किया गया कि शौचालय निर्माण में मनरेगा की ओर से भी लाभार्थियों को प्रति शौचालय चार हजार 500 की धनराशि दी जाएगी। पंचायती राज विभाग की ओर से संबंधित गांवों को धनराशि तो भेजी गई। मगर अधिकांश गांवों में शौचालय नहीं बन सके।
बताया जाता है कि संबंधित गांवों की ओर से मनरेगा के तहत डीआरडीए से शौचालय की धनराशि की मांग की गई, लेकिन मनरेगा में धनराशि खाते में भेजने प्रावधान था और सचिवों की ओर से लाभार्थियों आदि की फीडिंग नहीं कराने के कारण डीआरडीए ने भुगतान नहीं किया।
इसके बाद वर्ष 2015-16 व 2016-17 में शासन ने नमामि गंगे के तहत शेष 23 हजार 448 शौचालयों के निर्माण के लिए प्रति शौचालय 12 हजार की दर धनराशि भेजी। विभाग की ओर से गांवों को धनराशि भेजी गई लेकिन इसकी निगरानी नहीं की गई।
आलम यह है कि अधिकांश गांवों में लाभार्थियों के चयन की कार्रवाई से पहले शौचालय धनराशि के आहरण करने का काम किया गया। सूत्रों की मानें तो विभागीय अधिकारी की मिलीभगत से शौचालय धनराशि का बंदरबांट किया गया है।
गांवों में अभी भी आहरित धनराशि के सापेक्ष शौचालय नहीं बन सके हैं। हालांकि विभाग का दावा है कि अधिकांश शौचालय बनकर तैयार हो चुके हैं।