पैनल चर्चा में आईं लेखिका नीरजा माधव ने कहा कि बनारस और गाजीपुर मुखौटे वाले शहर नहीं हैं। जो जैसा है वैसा ही खुद को प्रस्तुत करता है। हर शहर का अपना स्वभाव होता है। मुंबई में माया हावी है। बनारस में अक्खड़ मिलेंगे। हम किसी को कुछ नहीं मानते। घाट पर गमछा पहने भोजपुरी बोलने वाला व्यक्ति गुमटी वाला है या खरबपति ये नहीं बता सकते।
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लेखक मृत्युंजय सिंह ने कहा कि कोलकाता में टैक्सी में ड्राइवर भोजपुरी गाने बजाते हैं तो लोग उसी आधार पर भोजपुरी को निम्न स्तरीय समझने की भूल कर देते हैं। भोजपुरी साहित्य के प्रतिनिधि मनोज भावुक ने भोजपुरी का प्रसार कर जड़ों से जुड़े रहने की बात कही। कहा कि इसी से भोजपुरी साहित्य का प्रसार होगा। मॉरीशस और फिजी में बसने वालों ने भोजपुरी को बचाए रखा लेकिन हम लोग भूलते जा रहे हैं।
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित चतुर्वेदी ने कहा कि चुनावों में जाति आधारित आकलन हर जगह होता है लेकिन यहां पर सिर्फ गाजीपुर-बलिया जैसे क्षेत्रों को जातिवादी क्यों बोला जाता है। इस बात को हमें स्वीकार करना होगा कि एक समान आकलन हो। किसी क्षेत्र को दोषी न ठहराया जाए। इस देश को एक और जय प्रकाश नारायण की जरूरत है।
अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधि भी पहुंचे
उद्घाटन सत्र में देश और विदेश से कई प्रतिष्ठित अतिथि मौजूद रहे। दक्षिण अफ्रीका में भारत के हाई कमिश्नर प्रो. अनिल सूकलाल, दक्षिण अफ्रीका के सांस्कृतिक सलाहकार व प्रसिद्ध कवि जोलानी म्किवा, गयाना हाई कमीशन के डिप्लोमैट केशव तिवारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि मैट सिडेलो और कामिला यूनीक, गिरमिटिया विरासत से जुड़े कलाकार राज मोहन और रेमोन भगवानदीन और दक्षिण अफ्रीका से आईं निलिस्त्रा सूकलाल ने भोजपुरी से जुड़कर जड़ों की ओर लौटने की बात कही।