रमजान के तोहफे के रूप में मिलने वाली ईद की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। बाजार भी पूरी तरह से ईद की खुशियां बांटने को तैयार है। बगैर सेवई के ईद की खुशियां मुकम्मल नहीं होती हैं। पूर्वांचल भर में बनारसी सेवइयों की धूम है। यहां की किमामी सेवई पूर्वांचल के साथ मध्य प्रदेश, बिहार, मुंबई, दिल्ली और कोलकाता भर में मशहूर है। यहीं वजह है कि रमजान भर इसकी खरीदारी के लिए दूर-दूर से लोग यहां आ रहे हैं। इसके साथ ही यहां सेवइयां दूसरे शहरों को कारोबार के लिए भेजी भी जा रही है।
25 साल से बना रहे सेवाइयां
भदऊं निवासी अर्जुन और प्रदीप कुमार का परिवार पिछले 25 सालों से यह काम कर रहा है। प्रदीप बताते हैं, ईद और रमजान को देखते हुए हम महीन, मध्यम और मोटी तीन तरह की सेवइयां बनाते हैं। इसकी मांग न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात व अन्य प्रांतों के साथ खाड़ी देशों तक रहती है। हस्तनिर्मित सेवइयों और दूधफेनी का स्वाद लाजवाब होता है। वहीं छड़, मोटी वाली, कांटी वाली, लछी कली, भुनी हुई सेवई आदि बनाई जाती है।
तीन पीढ़ी से सेवई बना रहा सच्चेलाल का परिवार
सेवई एसोसिएशन के महामंत्री सच्चेलाल अग्रहरि का परिवार तीन पीढ़ी से सेवई बनाने का काम कर रहा है। सच्चेलाल बताते हैं कि करीब 100 साल पहले मेरे दादा सूरत प्रसाद अग्रहरि ने हाथ से सेवई पारने का काम शुरू किया था। घर की महिलाएं भी इस काम में लगी हैं। अब मशीन आ गई है। छत पर लोहे के एंगल या बांस पर सेवई को सुखाया जाता है। सिर्फ ईद के दौरान करीब 50 हजार क्विंटल सेवइयां बिक जाती हैं।
भदऊं चुंगी में सिमट कर रह गई बनारसी सेवई
बनारस में पहले मदनपुर, दालमंडी, अर्दली बाजार आदि मुस्लिम इलाकों में भी सेवईयां बनतीं थीं, लेकिन अब सेवइयां बनाने का काम सिर्फ भदऊं चुंगी इलाके तक सिमट कर रह गया है। यहां 40 ऐसे दुकानदार है, जिनका सेवई बनाने का पुश्तैनी काम है। इस काम के जरिये वहां रहने वाले ढाई हजार परिवारों का घर चलता है।