70 साल बुजुर्ग जफरुन निसां जाएंगी हज पर
ताउम्र एक ही दुआ मांगी, आंखों में एक ही ख्वाब पाला। जब भी नमाज में सजदा किया, दरगाहों में मन्नत के धागे बांधे, एक ही अर्जी लगाई... हज के मुकद्दस सफर का। गरीबी मुफलिसी की जंग, घर की जिम्मेदारियां और फिर शौहर का इंतकाल लेकिन इन मुश्किलों में भी ऊपरवाले पर भरोसा बना रहा। दरगाह पर फूल-माला बेचती और दुआ में खुदा से दरियाफ्त करती। 70 साल की बुजुर्ग जफरुन निसां की दुआ आखिरकार कुबूल हुई। इस साल वो हज पर जा रही हैं।
हजयात्रियों की जारी सूची में जफरुन निसां ने जब अपना नाम देखा तो आंखें खुशी से भर आईं। हजरत तैयब शाह की दरगाह मंडुवाडीह पर फूल-माला बेचकर उन्होंने हज पर जाने की रकम जुटाई है। दो बेटे हैं वो भी मुफलिसी में जिंदगी काट रहे हैं। वे छोटा-मोटा रोजगार करते हैं। बच्चों को पालने-पोसने के लिए जफरुन निसां कभी संघर्षों से पीछे नहीं हटीं। दूसरों के घरों में झाड़ू-बरतन भी किया।
शौहर मो. उमर के इंतकाल के बाद तो बस एक ही ख्वाहिश रही कि किसी तरह परवरदिगार की पाक सरजमीं की जियारत नसीब हो जाए। इसके लिए पाई-पाई जुटाई। बेटों ने भी सहयोग किया लेकिन यहां एक परेशानी ये भी थी कि वो अकेले हज पर नहीं जा सकती थीं और बेटे को साथ में ले जाने का मतलब दोगुना खर्च। इसमें पूर्वांचल हज सेवा समिति के सदस्यों ने उनकी मदद की और औसानगंज से जा रहे एक परिवार के साथ ही उनका भी आवेदन करा दिया।
पहली बार उन्होंने आवेदन किया और किस्मत देखिए कि पहली बार में ही खुदा ने उनकी ख्वाहिश मंजूर कर ली। उनके बेटे मोहम्मद शमीम व मोहम्मद नसीम भी बेहद खुश हैं। बेटियों से भी जो मदद हुई उन्होंने की है। इसी तरह नई सड़क की 64 साल की शमीम जहां भी इस साल हज पर जा रही हैं। उन्होंने भी बड़ी मुश्किलों से अपने हज के ख्वाब को पूरा किया है।