मूर्ख दिवस की पूर्व संध्या पर वसुधैव कुटुंबकम की ओर से बृहस्पतिवार को 17वें धुरंधर हास्य महोत्सव का आयोजन हुआ। महोत्सव का शुभारंभ बुलडोजर पूजन, हवन और आरती के साथ हुआ। इसके बाद धुरंधर शपथ ग्रहण में कवियों ने अपनी ही कविता सुनाने की शपथ ली।
स्व. पं. धर्मशील चतुर्वेदी स्मृति धुरंधर हास्य सम्मान डंडा बनारसी को, स्व. पं. श्रीकृष्ण तिवारी स्मृति धुरंधर गीत सम्मान शैलेंद्र मधुर को, पं चंद्रशेखर मिश्र स्मृति धुरंधर ओज सम्मान डॉ. अतुल बाजपेयी तथा रामजियावन दास बावला स्मृति धुरंधर लोक कवि सम्मान लालजी यादव उर्फ झगड़ू भैया को दिया गया। बदरी विशाल ने लुंगी गमछा अऊर लंगोटा क ईहां सम्मान बा, होली इहां मशान में होला, अऊर भभूत शृंगार बा का बा काशी में ई बा... सुनाया।
डॉ. धर्म प्रकाश मिश्र ने कौन कहता है गिद्ध भारत से लुप्त हुए, पेड़ों की बजाय कुर्सियों पर पाए जाते हैं...। झगड़ू भैया ने बुलडोजर गरजी झोपड़पट्टी किस्मत पर रोई...सुनाकर तालियां बटोरी। जय प्रकाश ने जो नक्शे हैं किताबों में जिन्हें संतानें पढ़ती हैं, उन्हें पहले समर में वीर की तलवार गढ़ती है, अमर नाथ तिवारी ने बेटी बन के रहना अपने पति के चरणों की दासी, घर को बनाना स्वर्ग और घर वालों को स्वर्गवासी... सुनाकर श्रोताआें को लोटपोट किया। शैलेंद्र मधुर ने नामुमकिन मुमकिन हुआ, होता नहीं यकीन। यहां मदारी नाचते सांप बजाते बीन...। मुख्य अतिथि पद्मश्री बाबा शिवानंद, विशिष्ट अतिथि आलोक चंद्र शुक्ला रहे। इस दौरान नागेश शांडिल्य, जनार्दन शांडिल्य, गोपाल शुक्ला, मदन पांडेय, मनोज राय, संजीवधर दुबे, रामभरत ओझा, चन्नी सेठ, लल्लन तिवारी, डॉ. सरोज पांडेय, विनय मिश्रा व जयप्रकाश मिश्र आदि मौजूद रहे।