होलिका दहन के साथ ही बनारस की फिजां में होली की मस्ती घुल गई। गलियों से लेकर गंगा घाट तक फागुन का उल्लास हर किसी के सिर चढ़कर बोला। सुबह से ही होली खेलने की शुरुआत तो हो गई, लेकिन असल रंग तो होलिका दहन के बाद नजर आया। भद्रा की समाप्ति के बाद मध्य रात्रि के उपरांत मुहूर्त काल में ढोल नगाड़ों की थाप, हर-हर महादेव के जयघोष के बीच होलिका दहन किया गया।
बृहस्पतिवार को रात्रि में 12:57 बजे सबसे पहले शीतला घाट से होलिका दहन की शुरुआत हुई। घाट पर हुलियारों की टोली और काशीवासियों ने जमकर अबीर-गुलाल उड़ाए। होलिका दहन के बाद किशोर-युवाओं का हुजुम ‘जोगीरा, सारारारा... गाते- हुए शरारती मूड में आ गया। होलिका दहन से पूर्व होलिका का विधान पूर्वक पूजन हुआ। मंत्रोच्चार के बीच होलिका को लाल सूत से बांधा गया। बतासा, गुड़, तिल, जौ और मिश्रित औषधियों की लकड़ियां होलिका में डालने के बाद उसकी परिक्रमा की गई। नगर में कई स्थानों पर होलिका की मूर्ति भी लगाई गई थी।
ईको फ्रेंडली होलिका रही आकर्षण का केंद्र
पांडेयपुर, भोजूबीर, आशापुर, लंका, साकेतनगर, चेतगंज, लंका आदि इलाकों में उपले-गोहरी से तैयार होलिका का दहन हुआ। महमूरगंज, कमच्छा, विनायका, रवींद्रपुरी, दुर्गाकुंड,लंका,सामने घाट, लहुराबीर, जगतगंज, तेलियाबाग, अंधरापुर, नदेसर, कचहरी सहित वरुणा पार के इलाकों में मुहुर्त के साथ ही होलिका दहन का सिलसिला शुरू हो गया।
निभाई गई परंपरा
परंपरा के अनुसार परिवारों में लोगों ने सरसों का उबटन लगाकर हाथ पैर साफ किए। शरीर की मैल साफ करने वाला उबटन होलिका में डाला गया। मान्यता है कि ऐसा करने से शरीर निरोग रहता है। होली के दिन रंगोत्सव के बाद 18 मार्च की शाम काशी में पहला अबीर देवी चौसट्ठी को अर्पित करने की परंपरा है। काशी में अब भी सैकड़ों परिवार शाम को सबसे पहले चौसट्ठी घाट स्थित मंदिर में पहुंचकर अबीर अर्पित करते हैं। उसके बाद बड़ों और अपने मित्रों-शुभचिंतकों को अबीर लगाई जाती है।