बीएचयू अस्पताल में यूं तो एम्स जैसी सुविधाओं के होने का दावा किया जाता है, मगर हकीकत में पूर्वांचल के सबसे बड़े अस्पताल में मरीजों को कई बार स्ट्रेचर पर भी इलाज मयस्सर नहीं हो पाता। इसके अलावा इमरजेंसी में इलाज, ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने, खून जांच, एमआरआई, सीटी स्कैन करवाने से लेकर भर्ती होने के दौरान भी मरीजों को पेरशानी से रूबरू होना पड़ता है। आईएमएस बीएचयू के नए निदेशक प्रो.एसएन शंखवार के सामने इन परेशानियों को दूर कर सुविधाओं में तब्दील करना सबसे बड़ी चुनौती रहेगी। अस्पताल में ओपीडी में हर दिन छह से आठ हजार मरीज आते हैं। कुछ तो एक दिन पहले केवल इसी वजह से आ जाते हैं कि अगले दिन सुबह ओपीडी में वह संबंधित डॉक्टर को समय से दिखा सके।
इमरजेंसी में स्ट्रेचर का इंतजार
बीएचयू अस्पताल की इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को स्ट्रेचर के लिए भी इंतजार करना पड़ता है। बुधवार को सुबह करीब 11 बजे सुपरस्पेशियलिटी ब्लॉक में चलने वाली इमरजेंसी के गेट पर बने स्ट्रेचर कॉर्नर पर कोई स्ट्रेचर, व्हील चेयर नहीं दिखी।
सीसीआई में सारी जांच नहीं, लैब ढूंढते रह जाओगे
एक ही जगह मरीजों को जांच की सुविधा दिलाने के लिए बनी सीसीआई लैब में कई जांचें नहीं हो पाती हैं। बहुत सी जांचों का सैंपल लेकर मरीजों को मेडिकल कॉलेज में बने ऊषा सिंह लैब, ज्योतिशुक्ला लैब, मोहन शुक्ला लैब में जमा करने जाना होता है। इसमें मोहन लैब में महिलाओं के लिए कैंसर स्क्रीनिंग की जांच पैप, हिस्टोपैथालॉजी से जुड़ी जांच, एएफएनसी, ऊषा सिंह लैब में इम्यूनोलॉजी से जुड़ी कई तरह की जांच और ज्योतिशुक्ला लैब में हिमेटोलॉजी की जांच होती है। कई मरीजों को तो लैब खोजना ही कठिन होता है। किसी तरह सैंपल जमा करने के बाद मरीजों को दो-से तीन दिन बाद जांच रिपोर्ट के लिए बुलाया जाता है। ऐसे में अगर एक ही छत के नीचे जांच की सुविधा हो तो मरीजों को बड़ी राहत होगी।
बुधवार को अस्पताल में भर्ती आजमगढ़ निवासी एक महिला के पति जांच का सैंपल लेकर सीसीआई काउंटर पहुंचे। यहां पता चला कि जांच मेडिकल कॉलेज में होगी। पूछने पर बताया कि सैंपल को मोहन लैब में देना है। बहुत देर बाद मोहन लैब पहुंच सके। बताया कि कहीं लेब का नाम भी नहीं लिखा है। इस वजह से खोजना कठिन है।
चंदौली निवासी एक महिला की सर्जरी होनी है। डॉक्टर ने जांच लिखा तो दो जांच सीसीआई में हुई। जबकि दो जांच मेडिकल कॉलेज में कराने की बात कही। इसके बाद एक सैंपल ऊषा लैब और दूसरा ज्योति शुक्ला लैब में परिजनों ने जमा किया।
ओपीडी में टोकन की नहीं मिल पाती जानकारी
अस्पताल आने वाले मरीज ओपीडी में पर्चा जमा कर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। उन्हें अपने नंबर की जानकारी मिल सके, इसके लिए कई जगहों पर ओपीडी के बाहर टीवी स्क्रीन लगवाई गई थी, ताकी टोकन नंबर डिस्प्ले हो, लेकिन टीवी नहीं चल रही है।
अस्पताल में अगर डॉक्टर किसी मरीज को आईसीयू में भर्ती करने की सलाह देते हैं और मरीज उसे लेकर आईसीयू जाता है तो यहां भी उसे बेड खाली होने का इंतजार करना पड़ता है। बुधवार को भी आईसीयू के बाहर मरीजों के तीमारदार हाथ में पर्चा लेकर खड़े रहे। सबसे अधिक परेशानी तब होती है जब मरीज इमरजेंसी में रहता है। मंडलीय अस्पताल में भर्ती मंडुवाडीह निवासी एक युवक को भी आईसीयू बेड की जरूरत थी, लेकिन परिजनों ने जब बीएचयू में बेड की जानकारी की तो पता चला कि बेड खाली नहीं है।
अस्पताल में आने वाले मरीजों को रेडियोलॉजी में भी होने वाली जांच एमआरआई, कलर डाप्लर अल्ट्रासाउंड के लिए आगे की डेट दी जाती है। उन्हें संबंधित डेट पर आकर फीस जमा कराकर जांच कराने को कहा जाता हैं। इसमें अल्ट्रासाउंड के लिए 20 से 25 दिन तो एमआरआई के लिए दो से तीन माह का समय दिया जाता है। ऐसे में मरीज भी जो डेट मिलती है, उसको लेकर चले जाते हैं।