नागरी प्रचारिणी सभा का वैभव फिर लौटेगा। 50 हजार पांडुलिपियों के संरक्षण के साथ ही सभा की 25 हजार दुर्लभ पुस्तकें आमजन के लिए सुलभ होंगी। लंबे समय से बंद चल रहे आर्यभाषा पुस्तकालय का ताला भी खुल जाएगा। सभा के फिर से जीवंत होने पर हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों का हिंदी संसार समृद्ध होगा।
नागरी प्रचारिणी सभा 129 वर्षों का इतिहास सहेजे है। अब पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटाइजेशन के साथ ही उनका डाटाबेस तैयार करने का निर्णय लिया गया है। इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन को मिली है। पहले चरण में 30 लोगों का चयन कर उन्हें पांडुलिपि-संरक्षण में प्रशिक्षित किया जाएगा, फिर उनसे ही पांडुलिपि संरक्षण का काम कराया जाएगा। सभा में ही एक पांडुलिपि लैब बनेगी। पांडुलिपियों में सौ वर्ष से अधिक के प्राचीन साहित्य, पत्रिकाएं और हस्तलिखित दस्तावेज हैं।
सबसे महत्वपूर्ण सभा की पत्रिका सरस्वती के लिए लिखे गए स्वीकृत और अस्वीकृत लेख, कहानियां, कविताएं हैं। इसे आचार्य महावीर प्रसाद ने जूही के नाम से संग्रहीत किया था और सभा को दान दिया था। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंद दुलारे वाजपेयी, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, चंद्रधर शर्मा गुलेरी की रचनाएं प्रमुख हैं। इसमें सरस्वती के अंकों में प्रकाशित होने वाली कॉपियां और क्यों नहीं छपी इसका कारण भी है।