हिंदी के जाने माने लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बीएचयू में वर्ष 1950 में तत्कालीन कुलपति गोविंद मालवीय के विशेष अनुरोध पर बुलाए गए थे। यहीं नहीं यहां हिंदी विभाग में उन्हें आचार्य पद की तैनाती के साथ ही विभागाध्यक्ष भी बनाया गया। कुलपति के इस फैसले के बाद विभाग के शिक्षक नाराज हो गए और इसका विरोध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को झेलना पड़ा। आज आचार्य द्विवेदी की 115वीं जयंती हैं, ऐसे में उनके हिंदी लेखन में किए गए योगदान के आधार पर लोग उनको याद कर रहे हैं।
मूल रूप से बलिया जिले के आरत दूबे छपना गांव में आचार्य द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त 1907 को हुआ था। आचार्य द्विवेदी का काशी से बहुत गहरा जुड़ाव रहा। रविंद्रपुरी में आज भी उनका घर है। जहां गेट के सामने उनके नाम का बोर्ड भी लगा है। बीएचयू में हिंदी विभाग के प्रोफेसर और कवि प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल का कहना है कि आचार्य द्विवेदी 1930 से 1950 तक विश्व भारती शांति निकेतन पश्चिम बंगाल में हिंदी के शिक्षक रहे।
उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उस समय तत्कालीन कुलपति गोविंद मालवीय ने विशेष अनुरोध कर उन्हें बीएचयू के हिंदी विभाग में आचार्य और अध्यक्ष की नियुक्ति की। उन्होंने बताया कि यहां वह 1960 तक कार्यरत रहे। विशेष नियुक्ति की वजह से हिंदी विभाग के आचार्य पंडित जगन्नाथ प्रसाद, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने विरोध किया था। जिसके बाद 1960 में आचार्य द्विवेदी को शिक्षक पद से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद वह पंजाब विश्वविद्यालय चले गए और फिर वहां से लौटे तो 1967 से 1969 तक बीएचयू में दो साल तक कुलगुरु के पद पर जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।