स्वाधीनता आंदोलन का गवाह हसनपुर रियासत का किला खंडहर में तब्दील होता जा रहा। इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में पुरातत्व विभाग व किसी भी जनप्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया। सन 1857 के स्वाधीनता आंदोलन में इस राजघराने के राजा हुसैन अली का बड़ा योगदान था। शेरशाह सूरी भी हसनपुर रियासत में 19 दिन अपने लाव-लश्कर के साथ ठहरा था।
राजा हसनपुर बरियार सिंह की चौथी पुश्त त्रिलोकचंद्र के वंशज थे। उन्हीं के वंशज राजा हसन अली खां ने बाद में इस्लाम कुबूल कर लिया और 1857 में हसनपुर महल में शाही इमामबाड़ा बनवाया। इसके बाद हुसैन अली खां, मो. अली खां, मेंहदी अली खां हसनपुर रियासत के राजा रहे। राजा हसनपुर शक्तिशाली शासक थे। उनके पास सुल्तानपुर का काफी बड़ा क्षेत्रफल था। उन्हीं के नेतृत्व में 1857 में अंग्रेजों से बड़ी जंग हुई थी।
शहर से सटे अमहट के पास गोराबारिक में अंग्रेजों की छावनी थी। कर्नल फिशरमैन के नेतृत्व में यहां करीब 10 हजार फौज थी। अमहट भी जमींदारी का एक केंद्र था। यहां के लोगों ने अंग्रेजों से युद्ध करके उनकी फौज को मौत के घाट उतार दिया और कर्नल फिशरमैन की लाश को एक पेड़ पर लटका दिया था। इतिहासकारों के मुताबिक शेरशाह सूरी चंदेरी का किला फतेह करने के बाद जब सुल्तानपुर के रास्ते गुजर रहा था तो अपने लाव लश्कर के साथ राजा हसनपुर के महल में 19 दिन तक ठहरा था। उसी समय शेरशाह सूरी ने रोड के किनारे छांव के लिए पौधे और जगह-जगह पानी पीने के लिए कुएं की व्यवस्था कराई थी।