उत्तर प्रदेश की अंतिम विधानसभा सीट दुद्धी है। यहां से सात बार लगातार जीतने वाले विजय सिंह गोंड फिर से सपा के टिकट पर मैदान में हैं। यहां अब तक भाजपा का कमल नहीं खिला है। पिछली बार गठबंधन में अपना दल-एस को जीत मिली थी, लेकिन चुनाव से ठीक पहले विधायक हरिराम चेरो पाला बदलकर बसपा में चले गए थे। विजय सिंह गोंड के ही शिष्य रामदुलार गोंड को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने बड़ा दांव खेला है।
गुरु के नक्शेकदम पर चलते हुए रामराज बहुल बिरादरी गोंड मतदाताओं को तोड़ने में लगे हैं। कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। विजय के गढ़ में बढ़ती दरारें समर्थकों की चिंता बढ़ा रही हैं। इसी विधानसभा क्षेत्र में वह 11 गांव भी है, जो इस बार विधानसभा चुनाव में अंतिम बार वोट करेंगे। कनहर परियोजना के डूब क्षेत्र में शामिल इन गांवों के लोग अंतिम सीट पर अंतिम बार वोट कर नया इतिहास लिखने को भी मुखर हैं।
राबर्ट्सगंज सीट पर सपा से पूर्व विधायक अविनाश कुशवाहा और भाजपा से मौजूदा विधायक भूपेश चौबे मैदान में हैं। मुख्य लड़ाई इन्हीं के बीच मानी जा रही है। पक्ष-विपक्ष में सीधे बंटे वोटरों के बीच चुनाव मैदान में बसपा से उतरे अविनाश शुक्ल ने मामला उलझा दिया है। दलित और ब्राह्मण मतों के साथ वह मतदाताओं के लिए नया विकल्प दे रहे हैं। इससे सपा के परंपरागत मुस्लिम वोटर असमंजस में हैं।
मुस्लिम वोटों में विभाजन से सपा को जितना नुकसान होगा तो भाजपा उतने ही फायदे में होगी। राशन, तेल, नमक, आवास जैसी योजनाओं से भाजपा ने सुदूर वनों में रहने वाले जनजाति वोटरों में भी सेंध लगाई है। हाल यह है कि उठक-बैठक और तेल मालिश कर चर्चाओं में घिरे भूपेश कमल निशान के साथ फिर से कमाल करने की स्थिति में आ गए हैं।
घोरावल सीट पर भी मुकाबले में सीधे सपा और भाजपा ही है। यहां से सपा ने पूर्व विधायक रमेश दुबे को उतारा है तो भाजपा ने विधायक अनिल मौर्य को टिकट दिया है। वर्तमान विधायक अनिल से मतदाताओं की नाराजगी जगजाहिर हो चुकी है। बावजूद भाजपा ने उन्हें दोबारा मौका देकर बड़ा जोखिम लिया है, लेकिन मैदान में बड़हर-राजपुर स्टेट की बहू के पंजा निशान पर उतरने के बाद यह मुश्किल भी दूर हुई है।
बसपा ने कुशवाहा प्रत्याशी देकर विधायक से नाराज लोगों को एक विकल्प दिया है। ऐसे में जो वोट सपा के साथ जुड़ सकते थे, वह अब कांग्रेस और बसपा के साथ जाने लगे हैं। सपा यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण मतों के सहारे है तो भाजपा मोदी मैजिक का सहारा लेकर सबको एकजुट करते हुए बढ़त बनाने में लगी है।
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यूपी को रोशन करने वाला ऊर्जांचल क्षेत्र ओबरा विधानसभा सीट में ही है। बिजली और कोयला परियोजना वाले इस क्षेत्र में नगरीय मतदाताओं की अधिकता से भाजपा की राह आसान है। राज्य मंत्री संजीव सिंह गोंड के लिए यह चुनाव सिर्फ अंतर बढ़ाने का ही मौका माना जा रहा है।
सपा ने गोंड जनजाति से ही अरविंद उर्फ सुनील गोंड तो कांग्रेस ने रामराज गोंड को उतारकर जातीय समीकरणों में घेरने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन उनकी कोशिशें फिलहाल साकार होती नहीं दिख रहीं। खरवार और दलित मतदाताओं के साथ लखनऊ पहुंचने की मंशा पाले बसपा के सुभाष खरवार का भ्रम भी टूटने लगा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं को घर से निकालकर बूथों तक पहुंचाने की है। जितनी ज्यादा वोटिंग होगी, भाजपा की जीत का अंतर भी उतना ही अधिक हो सकता है।