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आज रात होलिका दहन, कल बरसेगा रंग

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लालबाग बाजार में होली पर्व को लेकर खरीददारी करती महिलाएं। - संवाद - फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। रंगों का उत्सव होली 18 मार्च को मनाई जाएगी। परंपरा अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को शुभ मुहूर्त 17 मार्च की मध्यरात्रि में किया जाएगा।
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नैमिष के पंडित विवेक द्विवेदी ने बताया कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 17 मार्च की रात 12:58 से 2:10 बजे तक है। इस समय होलिका दहन करना फलदायी होगा। होलिका दहन में किसी वृक्ष की शाखा को जमीन में गाड़कर उसे चारों तरफ से लकड़ी, कंडे व उपले से घेरकर निश्चित मुहूर्त में जलाना चाहिए।
भारतीय नव संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की पहली तिथि को शुरू होता है। इसके आगमन के पूर्व पुराने संवत्सर को विदाई देने और इसकी नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए होलिका दहन किया जाता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए काले तिल के दाने, बीमारी से मुक्ति के लिए हरी इलायची व कपूर, धन लाभ के लिए चंदन की लकड़ी, रोजगार के लिए पीली सरसों, विवाह व वैवाहिक समस्याओं के लिए हवन सामग्री, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति के लिए काली सरसों डालना चाहिए। 18 मार्च को रंग खेला जाएगा।
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नैमिष तीर्थ में रंगोत्सव के बाद शुक्रवार शाम को परंपरागत ढंग से होली मिलन व आगामी हिन्दू नव वर्ष का फलादेश सुनाया जाएगा। जिसमें नए वर्ष में राशियों पर ग्रहों के प्रभाव, वर्षा, फसल, राष्ट्र और विश्व पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का भी विवेचन किया जाएगा। जिसके बाद सभी लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेंगे।
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भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए भगवान ने रची थी माया
होलिका दहन से जुड़ी सबसे प्राचीन कथा श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में मिलती है। कथा के अनुसार, भगवान श्रीहरि के प्रिय भक्त प्रहलाद का जन्म राक्षस कुल में हुआ था। उसका पिता हिरण्यकश्यप श्रीहरि विष्णु से द्रोह रखता था। उसने क्रोधवश अपने पुत्र प्रहलाद को बहन होलिका के साथ अग्नि में बिठा दिया। होलिका को अग्नि से रक्षा का वरदान प्राप्त था। लेकिन भगवान की कृपा से प्रहलाद की रक्षा हो जाती है और होलिका की मृत्यु हो जाती है। तबसे होलिका दहन की परंपरा प्रचलन में है।
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