प्रयाग में प्रथम शाही स्नान के साथ ही आस्था का सबसे बड़ा मेला महाकुंभ शुरू हो गया। मकर संक्रांति पर बने ग्रहों के दुर्लभ संयोग के बीच चारों पीठों के शंकराचार्यों ने खुद को महाकुंभ से दूर रखा। चारों पीठों के लिए मेले में एक साथ जमीन ना दिए जाने से नाराज शंकराचार्यों ने महाकुंभ का बहिष्कार किया है।
गौरतलब है कि शंकराचार्यों ने महाकुंभ मेले में संगम किनारे चारों पीठों को अलग-अलग जमीन देने के बजाय एक साथ एक चौराहे पर चतुष्पथ के रूप में स्थापित किए जाने के लिए जमीन की मांग की थी। स्थानीय प्रशासन ने शंकराचार्यों की मांगे मानने से इंकार कर दिया था। इससे नाराज चारों शंकराचार्य कुंभ मेले में नहीं पहुंचे।
देश में कुल चार शंकराचार्य पीठ- ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम पीठ हिमालय, शारदा पीठ द्वारिका, पुरी पीठ जगन्नाथ और शृंगेरी पीठ कर्नाटक हैं। प्रशासन से जमीन नहीं मिलने के कारण चारों शंकराचार्य मेले में शामिल नहीं हुए हैं। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद महाराज ने बताया कि प्रशासन के हठीले रवैये ने हमें दुखी किया है। प्रशासन अगर हमें चतुष्पथ के लिए जमीन नहीं सकता तो हम भी मेले में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि चारों शंकराचार्यों ने मेले का बहिष्कार किया है।
इससे पहले दंडी संन्यासियों ने भी अव्यवस्था से नाराज रविवार को कुंभ के पहले स्नान का बहिष्कार कर दिया था। संन्यासियों ने गंगाजल लेकर संकल्प लिया था कि जब तक व्यवस्थाएं पूरी नहीं हो जातीं, वे डुबकी नहीं लगाएंगे। कई दिनों से दंडी संन्यासी सेक्टर नौ स्थित दंडी बाड़ा, हरिश्चंद्र मार्ग के गंगातट पर कई मांगों को लेकर बेमियादी अनशन पर थे।