परिवाद में बताया कि एजेंट के माध्यम से उन्होंने फरवरी 2015 में अपनी व अपने परिवार के सदस्यों की स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी बीमा पॅालिसी ली थी, जिसमें प्रत्येक के स्वास्थ्य का पांच लाख रुपये का हेल्थ कवर था। उसने प्रीमियम के 15427 रुपये जमा कराए थे। एक साल बाद 2016 में 15721 रुपये प्रीमियम लेकर पॉलिसी का नवीनीकरण किया गया और रिस्क कवर 1,25,000 रुपये बोनस जोड़कर 6,25,000 रुपये कर दिया था।
27 जनवरी 2017 को परिवादी की कार का एक्सीडेंट हो गया था, जिसमें वह घायल हो गए थे। वे पहले मेरठ और बाद में दिल्ली के अस्पताल में भर्ती रहें। बीमा क्लेम के रूप में 7,23,257 रुपये हुए। इंश्योरेंस कंपनी ने पॉलिसी का नवीनीकरण कराने पर क्लेम पास होना बताया। साथ ही डेढ़ लाख रुपये बोनस और हेल्थ कवर बढ़कर 7,75,700 रुपये होना बताया। परिवादी ने विश्वास कर 15790 रुपये का प्रीमियम देकर पॉलिसी का नवीनीकरण करा लिया।
्पीड़ित का आरोप है कि 10 जून 2017 को मनमाने तरीके से इंश्योरेंस कंपनी ने बिना किसी आधार के पॉलिसी से उनका नाम काटते हुए 3318 रुपये का चेक वापस भेज दिया। परिवादी ने धोखे से पॉलिसी से बिना कारण के मनमाने तरीके से इंश्योरेंस कंपनी ने परिवादी को अलग करते हुए उनकी पॉलिसी खत्म कर दी।
आयोग के अध्यक्ष हेमंत गुप्ता ने इंश्योरेंस कंपनी के विरुद्ध परिवाद स्वीकार करते हुए आदेशित किया कि वह बीमा पॉलिसी का बीमा क्लेम छह लाख 25 हजार रुपये बीमा क्लेम की निरस्तीकरण की तिथि से और दूसरी पॉलिसी के संबंध में 15790 रुपये प्रीमियम धनराशि प्राप्त करने की तिथि से नौ प्रतिाशत साधारण वार्षिक ब्याज अंतिम भुगतान की तिथि तक और परिवाद व्यय के 10 हजार रुपये परिवादी को अदा करने हेतु आयोग में जमा करें।
आयोग ने सेवा में कमी एवं अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए बीमा कंपनी पर 50 हजार रुपये का अर्थदंड अधिरोपित किया। अर्थदंड की धनराशि नियमानुसार राजकोष में जमा की जाएगी। साथ ही इंश्योरेंस कंपनी को आयोग ने यह भी आदेशित किया कि वह परिवादी का पूर्ण चिकित्सा परीक्षण किए जाने के बाद नियमानुसार परिवादी का सामूहिक बीमा पाॅलिसी के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा करें।