शामली। वेस्ट यूपी की अहम सीट मानी जाने वाली कैराना लोकसभा सीट का इतिहास गवाह है कि इस सीट पर हमेशा जाट-मुस्लिम गठजोड़ के बूते गैर भाजपा दलों ने जीत का परचम लहराया है। इस बार भाजपा-रालोद का गठबंधन होने के बावजूद सपा प्रत्याशी इकरा हसन जाट और अन्य बिरादरियों के मतदाताओं में भी सेंध लगाने में कामयाब रही, जिसके कारण जीत दर्ज की। इस सीट पर अब तक हुए चुनावों में 17 में से 15 चुनाव में जाट और मुस्लिम प्रत्याशियों के सिर पर ही जीत का सेहरा बंधा है।
हालांकि, 1993 में हुए दंगों के बाद जाट ओर मुस्लिमों में आई खटास के बाद यहां पर चुनावी समीकरण बदल गए। दंगों के बाद यहां पर हुए पिछले चार में से दो चुनावों में भाजपा के टिकट पर गुर्जर प्रत्याशियों ने कैराना का किला फतह किया है।
कैराना लोकसभा सीट की बात की जाए तो पहले जनता पार्टी और इसके बाद रालोद जाट और मुस्लिमों के सियासी गठजोड़ के सहारे ही अपनी जीत हासिल करता आया है। इस सीट पर करीब साढ़े पांच लाख मुस्लिम और दो लाख के करीब जाट मतदाता है। चुनावी इतिहास में जब भी जाट और मुस्लिमों ने एकजुट होकर मत दिया, जीत का सेहरा उनकी ही बिरादरी के सिर पर बंधा है। अब तक इस सीट पर हुए 17 बार के लोकसभा चुनाव और उपचनुाव में सात बार जाट, आठ बार मुस्लिम प्रत्याशी जीते हैं, लेकिन दंगों के बाद आई जाट मुस्लिम मतों में खटास के बाद इस सीट पर हुए चार चुनाव में दो में भाजपा के गैर जाट ने कैराना का किला फतह किया है।
इस बार भी सपा से मुस्लिम प्रत्याशी इकरा और भाजपा से गुर्जर प्रत्याशी प्रदीप चौधरी चुनाव मैदान में थे। इकरा ने मुस्लिमों के अलावा जाट और अन्य बिरादरी के मतों में भी सेंध लगाई, जिसके कारण उसने 69116 मतों से जीत दर्ज की।
गठजोड़ के कारण अनुराधा ने बना दिया था अधिक मतों से जीतने का रिकॉर्ड
वर्ष 2004 में सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी रालोद की प्रत्याशी अनुराधा चौधरी ने रिकॉर्ड पांच लाख 23 हजार 927 मत हासिल कर बसपा के शाहनवाज को एकतरफा चुनाव में सवा तीन लाख से भी ज्यादा मतों से मात दी थी। हालांकि 2009 से गठबंधन होने के कारण यह सीट भाजपा के हिस्से में आ गई थी। भाजपा के कारण मुस्लिमों ने रालोद से किनारा कर लिया था। नतीजन भाजपा गठबंधन प्रत्याशी का साथ नहीं दिया। जिस कारण सीट पर भाजपा रालोद प्रत्याशी हुकुम सिंह चुनाव हार गए थे।
2018 के उपचुनाव में सभी दलों ने की थी भाजपा की घेराबंदी
वर्ष 2018 में इस सीट पर हुए उपचुनाव में विपक्षी दलों ने भाजपा की घेराबंदी की थी। जाट और मुस्लिम मतों का बिखराव ना हो इसलिए सपा नेता तबस्सुम हसन को रालोद ने अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाया था। बसपा ने भी समर्थन दिया था। नतीजा हुआ कि जाट, मुस्लिम और दलित गठजोड़ के चलते इस सीट पर तबस्सुम हसन सांसद बन गईं थी। 2019 में हुए चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर फिर से तबस्सुम हसन को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन जाट मतों का साथ न मिलने ओर दलितों को भी मत भाजपा को मिलने की वजह से इस सीट पर फिर से भाजपा प्रत्याशी प्रदीप चौधरी जीते थे।
कैराना में अब तक जीते जाट प्रत्याशी
वर्ष प्रत्याशी पार्टी
1962 यशपाल सिंह निर्दलीय
1977 चंदन सिंह जनता पार्टी
1980 गायत्री देवी जनता पार्टी एस
1989 हरपाल पंवार जनता दल
1991 हरपाल पंवार जनता दल
1999 वीरेंद्र वर्मा भाजपा
2004 अनुराधा चौधरी रालोद
मुस्लिम प्रत्याशी
1967 गय्यूर अली खान सोशलिस्ट पार्टी
1971 शफाकत जंग कांग्रेस
1984 अख्तर हसन कांग्रेस
1996 मुनव्वर हसन सपा
1998 अमीर आलम खां रालोद
2009 तबस्सुम बेगम बसपा
2018 तबस्सुम बेगम सपा रालोद
2024 इकरा हसन सपा
गुर्जर प्रत्याशी
2014 हुकुम सिंह भाजपा
2019 प्रदीप चौधरी भाजपा