शाहजहांपुर। पुवायां के नगरिया बुजुर्ग निवासी ओमेंद्र सिंह खेतीबाड़ी पहले ही छोड़ चुके थे। 2015 में मधुमक्खी पालन का शौक जागा। धीरे-धीरे शौक जुनून बनता गया और अब ओमेंद्र 30 से 35 क्विंटल शहद का सालाना उत्पादन करते हैं जो अमरोहा, बदायूं, रामपुर के व्यापारियों के मार्फत खाड़ी देशों के साथ ही अन्य देशों तक जा रहा है।
45 साल के ओमेंद्र के पास पांच एकड़ जमीन है। पहले वह उस पर गन्ना और गेहूं की फसल करते थे। पारंपरिक फसलों में मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम देखकर उन्होंने अन्य रोजगार की ओर रुख किया। शौकिया मधुमक्खी का पालन शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका रोजगार विस्तारित होने लगा। उनके पास बदायूं, अमरोहा, रामपुर आदि से शहद की खरीदारी करने वाले ट्रेडर्स पहुंचने लगे।
ओमेंद्र बताते हैं कि उनके पास वर्तमान में मधुमक्खी के 70 बाक्स हैं। पूरे वर्ष में प्रत्येक बॉक्स से 20 से 50 किलो तक शहद उत्पादित हो जाता है। ट्रेडर्स उनसे शहद खरीदकर ले जाते हैं जहां से अमेरिका और अरब कंट्री में शहद की सप्लाई की जाती है। ओमेंद्र अपने व्यवसाय के जरिये अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। संवाद
मधुमक्खी के बाक्सों के साथ होता रहता सफर
मधुमक्खियां अब ओमेंद्र की साथी बन गईं हैं। जहां पर मधुमक्खी के पराग और रस मिलने की संभावना होती है, ओमेंद्र गाड़ी में बॉक्स लादकर चल देते हैं। शाहजहांपुर में फूलों का रस पर्याप्त मात्रा में न मिलने के कारण वह बदायूं के उसावां में मक्का, बाजारा, खीरा, ककड़ी की फसल के आसपास पहुंच गए हैं। ओमेंद्र बताते हैं कि मधुमक्खी पालक दूरी की परवाह नहीं करते हैं। वर्तमान समय में कुछ मधुमक्खी पालक लीची की फसल के कारण उत्तराखंड, सेब के लिए कश्मीर तक पहुंच गए हैं। इस समय रस नहीं मिलता है, पर पराग मिल जाता है। शहद के साथ पराग का ज्यादा योगदान होता है।
नवंबर से शहद उत्पादन का समय शुरू
पूरे साल शहद का उत्पादन नहीं होता है, बल्कि उसका भी एक समय होती है। नवंबर से शहद उत्पादन का समय शुरू हो जाता है। यह होली के बाद तक चलता है। इस बीच शहद का भरपूर उत्पादन होता है। बरसात के दिनों में जब धूप नहीं निकलती है तो उत्पादन प्रभावित होता है।
कोई डिग्री और डिप्लोमा नहीं, पर कुशल पालक बन गए
मधुमक्खी पालन के बारे में ओमेंद्र को काफी जानकारी है। उन्होंने कोई डिप्लोमा नहीं किया। फिर भी एक कुशल पालक बन गए। ओमेंद्र बताते हैं कि मधुमक्खी की अध्ययन वाली किताबों से काफी जानकारी मिली। पालकों ने भी अच्छा मार्गदर्शन किया है। कक्षा नौ तक पढ़े ओमेंद्र ने उद्यान विभाग से संचालित योजनाओं का लाभ लिया है।
-हम सिर्फ कक्षा नौ तक पढ़े हैं। विज्ञान वर्ग से हाईस्कूल कर रहे थे। काकोरी शहीद इंटर कॉलेज में हमारी प्रयोगात्मक परीक्षा थी। तब हम अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने चले गए थे। चाचा ने हमारी पिटाई कर दी थी। इसके बाद पढ़ाई छूट गई। मधुुमक्खी पालन का व्यवसाय काफी बेहतर है। हमारा उत्पादित शहद विदेशों तक सप्लाई होता है। -ओमेंद्र सिंह, मधुमक्खी पालक।