शाहजहांपुर। परौर के गांव कुडरिया निवासी सत्यओम भी अपने घर लौट आए। वह रोमानिया के रास्ते तीन मार्च को दिल्ली आए थे और नोयडा में रुके थे। रविवार को गांव आने पर मां जयश्री ने देवी मां की आरती उतारी और प्रसाद चढ़ाया। इस बीच सत्यओम ने यूक्रेन की मुश्किल हालात को बयान किया। सत्यओम ने बताया कि वह यूक्रेन के क्रोपो विनिस्ती की डोनेस्ट नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस कर रहे हैं।
24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर अटैक कर दिया। तब से हम सब बंकर में थे। वहां लाइव सिटी के कैमरों द्वारा यू-ट्यूब के जरिये शहर की स्थिति को देख सकते थे। वहां की हालात काफी ज्यादा खराब थी। तनावपूर्ण स्थिति होने पर यूनिवर्सिटी के कैंपस तक के कैमरे बंद कर दिए गए। पूरे दिन में कई बार सायरन की आवाज आने पर बंकर में जाना पड़ता था। खतरा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा था। एक साथ दस फाइटर जेट प्लेन गुजरने पर सभी छात्र सहम जाते थे। खाने-पीने का इंतजाम भी हम लोगों के पास नहीं रह गए थे। एटीएम में रुपये नहीं रह गए थे। पीने के पानी तक पर संकट खड़ा हो गया था। यूक्रेन ने अपने नागरिकों को लड़ने के लिए हथियार दे दिए थे। जिसके चलते स्थिति बहुत खतरनाक हो गई थी। लूटमार जैसी हालात बनने पर बस के जरिए यूक्रेन के हंगरी बॉर्डर पहुंचे थे। वहां भीड़ ज्यादा होने पर काफी लंबा इंतजार करना करना पड़ा। बॉर्डर पार करने के बाद रोमानिया के रास्ते घर वापसी हो पाई। रविवार को घर आए सत्यओम को देखकर चाचा दीनदयाल और जयश्री के चेहरे खिल उठे।
बेटे का मेसेज आने के बाद मिला काफी सुकून
शाहजहांपुर। महमंद जंगला निवासी मोहम्मद आसिफ के बेटे मोहम्मद सानी की घर वापसी की राह धीरे-धीरे आसान होना शुरू हो गई। रविवार को व्हाट्सएप पर सानी का वॉयस मेसेज आने के बाद परिजन ने राहत की सांस ली है। अब उन्हें उम्मीद बंध गई कि बेटा जल्द ही घर वापस आ जाएगा।
मोहम्मद आसिफ के मुताबिक, सानी का सुबह वॉयस मेसेज आया था। वह शनिवार को बस से चल दिया था। एक बस को बदलकर दूसरे में सवार हुए। वह बस खराब हो गई तो तीसरी में सवार हुए। बस में 41 छात्र-छात्राएं सवार हैं। सभी रोमानिया बॉर्डर की तरफ जा रहे हैं। उम्मीद है कि जल्द ही बेेटे की वापसी हो जाएगी। बेटे का मेसेज आने के बाद पूरे परिवार ने काफी राहत की सांस ली है। सानी की मां सबिहा ने खाना-पीना तक छोड़ दिया था। बेटे का मेसेज आने के बाद उन्होंने भी खाना खाया है।
दीपांशु और अभिषेक दिल्ली पहुंचे
-आनंदपुरम कालोनी निवासी संजय वर्मा के पुत्र दीपांशु वर्मा और अभिषेक वर्मा भी रविवार सुबह दिल्ली पहुंच गए। वह अपनी बुआ के घर पर रुके हुए हैं। संजय वर्मा ने बताया कि बेटे काफी ज्यादा थके हुए हैं। इसलिए यहां पर नहीं आए हैं। वह बुआ के घर दो दिन रुकने के बाद घर आएंगे।
धमाकों की आवाज बंकर में छिपे होने के बाद भी कलेजा चीर रहीं थीं
जलालाबाद। कस्बे के पुलकित भारद्वाज की भी घर वापसी हो गई। बेटे के सकुशल वापस आने पर घर में जश्न का माहौल है। परिजन भगवान का शुक्रिया अदा करने के साथ ही सरकार के प्रयास की सराहना कर रहे हैं।
शनिवार सुबह करीब सात बजे सरकारी फ्लाइट से पुलकित हंगरी से दिल्ली पहुंच गया। वहां सारी कार्यवाई पूरी होने के बाद यूक्रेन के विभिन्न शहरों से लाए फर्रूखाबाद, ललितपुर व चित्रकूट जनपद के चार छात्रों को गाड़ी से बदायूं होकर लाया गया। रात दस बजे जरियनपुर तिराहे पर पुलकित को परिजन के सुपुर्द कर गाड़ी अन्य बच्चों को लेकर रवाना हो गई। पुलिकत के मुताबिक, कीव में काफी डर का माहौल था। धमाकों की आवाजें बंकर में छिपे होने के बाद भी कलेजा चीर रही थीं। 27 फरवरी को भारतीय दूतावास की ओर से सूचना मिली कि वह लोग हंगरी बॉर्डर तक किसी तरह पहुंचे। 28 फरवरी की सुबह जान जोखिम में डालकर अन्य छात्र-छात्राओं के साथ नौ किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके उजरोज पहुंचे। यहां के रेलवे स्टेशन पर हजारों की भीड़ थी। किसी तरह ट्रेन में चढ़े और नौ घंटे का सफर खड़े होकर करने के बाद देर रात हंगरी बॉर्डर पहुंचे।
यहां दूतावास के अधिकारियों ने भारतीयों को रिसीव कर बुडापेस्ट के हवाई अड्डे पर पहुंचाया। तीन दिन यहां गुजारने के बाद उसे वहां से भारतीय विमान से दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर कई दिन बाद खाना नसीब हुआ। कीव के बंकर से लेकर हंगरी तक बिस्किट, ब्रेड आदि खाकर ही समय गुजारा। वहां तिरंगा झंडा देखने के बाद रूसी सैनिक आराम से जाने दे रहे थे। जिसको देखकर पाकिस्तान समेत कई अन्य देश के छात्र-छात्राएं भी तिरंगे झंडे का प्रयोग कर रहे थे। एक कागज पर अपने हाथ से तिरंगा झंडा बनाकर यूक्रेन से निकल सके। उसकी जेब में वह झंडा अभी भी सुरक्षित रखा है।