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महाकुंभ में महिला अखाड़ों का होता उदय

Thu, 17 Jan 2013 08:22 AM IST
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो
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पुरुष वर्चस्व वाले अखाड़ों में महिलाओं की संख्या में इजाफा हो रहा है। अखाड़ों में महिला महामंडलेश्वरों और संतों की संख्या तकरीबन 100 के करीब पहुंच गई है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। इस कुंभ में पहली बार माईबाड़ा को अखाड़े का दर्जा दिया गया है। यही नहीं, अब उनकी अपनी धर्मध्वजा भी होगी।
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संतों और भक्तों की संख्या बढ़ी
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शाने में लगीं महिलाओं ने अब धर्म की ध्वजा भी उठा ली है। कुंभ मेले में आने वाली महिला मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और महिला संतों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। यह यकायक नहीं है। इसकी रूपरेखा 2001 महाकुंभ से ही तैयार होने लगी। न सिर्फ महिला संतों की संख्या बढ़ी है, बल्कि उनके भक्तों की संख्या भी हजारों में पहुंच गई है। तमाम बड़े धार्मिक संगठन और आश्रमों की प्रमुख महिला संत ही हैं।

अब अपनी धर्मध्वजा
जूना अखाड़े में इस बार जब माईबाड़ा बना तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि महिला संतों का अपना अखाड़ा होगा लेकिन यह सपना सच हो गया। श्री महंत देव्यागिरी के अथक प्रयासों से अपना अखाड़ा बना। इसको संन्यासिनी दशनामी अखाड़े का नाम दिया गया। महिला संन्यासियों की अपनी धर्मध्वजा तो मिली ही, अपना नियम कानून बनाने का अधिकार भी मिल गया। इसे महिला संतों की बड़ी जीत माना जा रहा है। संन्यासिनी दशनामी अखाड़ा की अध्यक्ष देव्यागिरी का कहना है कि यह पहली उपलब्धि है। आगे अखाड़े के स्वरूप को और विकसित किया जाएगा।   
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अन्य महिला संतों ने भी इस प्रयास को काफी सराहा है। सबसे बड़ी बात कि जूना अखाड़े के महंतों और पदाधिकारियों का इसे समर्थन है। यह अखाड़ा कितना शक्तिशाली होने जा रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां महिला संन्यासियों की संख्या पांच हजार से ऊपर पहुंच गई है।

निरंजनी देगा महामंडलेश्वर की उपाधि
बिहार के रोहताश का एक इलाका है रायपुर भोरे। यहां श्री अद्वैदस्वरूप संन्यास आश्रम की अध्यक्ष हैं साध्वी निर्भयानंद पुरी। करीब 38 सालों से अपने गुरू महाराज परमहंस ज्ञानानंद जी के दिखाए सत्मार्ग पर चलकर समाज की सेवा कर रही हैं। उनकी सेवा, समर्पण और व्यक्तित्व देखते हुए निरंजनी अखाड़े ने महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित करने का निर्णय लिया है। 23 जनवरी को पट्टाभिषेक होगा। साध्वी निर्भयानंद पुरी का आश्रम न सिर्फ बिहार बल्कि, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत कई प्रदेशों में समाज की सेवा कर रहा है। गुरु की भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति उनका मुख्य लक्ष्य है। उनके भक्तों की संख्या हजारों में है।

महानिर्वाणी दे चुकी उपाधि
कुंभ मेले में इस बार महानिर्वाणी ने महिला संत वेदगिरी को महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित किया। विभिन्न अखाड़ों ने चादर चढ़ाकर महिला संत वेदगिरी को अपना समर्थन दिया। इस बार सबसे खास बात यह रही कि सबसे पहले किसी पुरुष को नहीं बल्कि महिला को महामंडलेश्वर बनाया गया। संत वेदगिरी पंजाब के लुधियाना में आश्रम चलाती हैं। पिछले चार दशकों से उन्होंने धर्म और समाज की सेवा की है। उनके आश्रम के तमाम स्कूल और अस्पताल भी चलते हैं।

महिलाओं द्वारा संचालित बड़े आश्रम
महिलाएं कई बड़े आश्रम चला रही हैं। कुछ की तो संचालिकाओं से लेकर कार्यकर्ता तक महिलाएं ही हैं। इसमें सबसे प्रमुख प्रजापिता ब्रम्हकुमारी आश्रम है। माउंट आबू स्थित इस आश्रम के मुख्यालय से लेकर देश के दूर दराज के इलाकों में स्थित छोटे आश्रमों तक हर जगह महिलाएं ही इसकी प्रमुख हैं। इसी तरह नारायणी आश्रम का प्रबंध तंत्र महिलाएं ही संभालती हैं। अपर्णा भारती को जगतगुरु की उपाधि मिल चुकी है।

श्री अद्वैतस्वरूप संन्यास आश्रम की अध्यक्ष साध्वी निर्भयानंद पुरी ने कहा कि अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। महिला प्रत्येक क्षेत्र की तरह इस क्षेत्र में अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
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