सूफी निजामुद्दीन का नौवां सलाना उर्स शुरू
देर रात तक मजार पर चादरपोशी और गुलपोशी करते रहे जायरीन
अमर उजाला ब्यूरो
दुधारा। विकास खंड सेमरियावां के अगया में सोमवार से मशहूर सूफ़ी बुजुर्ग हजरत सूफी निजामुद्दीन साहब का नौवां सालाना उर्स अकीदत के मनाया जा रहा है। काफी संख्या में अकीदतमंदों ने मजार पर चादरपोशी की। देर शाम निजामी कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इस दौरान उलेमा ने हजरत निजामुद्दीन की जिंदगी पर प्रकाश डाला। बाद में लोगों ने मजार पर फातेहा पढ़कर देश में अमन और शांति की दुआ मांगी।
सोमवार की सुबह में फज्र की नमाज के बाद सूफी साहब की मजार पर कुरानख्वानी की गई। इसके साथ ही उर्स का कार्यक्रम औपचारिक रूप से शुरू हुआ। दोपहर में जोहर की नमाज के बाद सज्जादा नशीन मौलाना हबीबुर्रहमान निजामी परंपरागत डोली पर सवार होकर मजार तक पहुंचे। बाद में उनके नेतृत्व में श्रद्धालुओं ने मजार पर चादरपोशी और फातेहाख्वानी की। इसके बाद क्षेत्र के दर्जनों गांवों और दूर-दराज से बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु अपनी-अपनी चादरें लेकर छोटे-छोटे जुलूस के रूप में पहुंचते रहे और चादरपोशी व गुलपोशी करते रहे। चादरपोशी और फातेहाख्वानी का यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा। देर शाम निजामी कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें देश के कई बड़े इस्लामिक विद्वानों ने लोगों को संबोधित किया। इस दौरान मौलाना हबीबुर्रहमान, मौलाना जियाउल मुस्तफा निजामी, मौलाना मशहूद अहमद आजमी, मौलाना मोहम्मद सईद निजामी, मुफ्ती शकीलुर्रहमान, डॉक्टर अनीस अहमद, हाफिज महबूबुर्रहमान, आदि मौजूद रहे।
इस्लामिक शिक्षा के प्रसार में खपा दी जिंदगी
ऑल इंडिया बज्मे निजामी के प्रमुख और सज्जादा नशीन के साहबजादे मौलाना जियाउल मुस्तफा निजामी ने बताया कि सूफ़ी निजामुद्दीन साहब पूरा जीवन इस्लामी शिक्षा के प्रसार में लगे रहे। वह काफी नेक इंसान और सादगी पसंद थे। इसकी वजह से विद्यार्थी जीवन में ही उनके उस्ताद और काफी प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान रहे हाफिज-ए-मिल्लत ने उन्हेें सूफी के उपनाम से नवाजा था। वह 20 वर्षों तक अमरडोभा के मदरसे में बच्चों को निशुल्क शिक्षा देते रहे। देश के दो मशहूर सूफ़ी सिलसिलों से उन्हें खिलाफत मिली थी। वे इस्लामिक शिक्षा के विद्वान और प्रखर वक्ता के तौर पर जाने जाते थे और मुसलमानों के सभी तबके में इनकी काफी लोकप्रियता थी। देश-विदेश में उनके करीब पांच लाख से अधिक मुरीद हैं। उनके नाम निजामुद्दीन के कारण इनसे संबंधित निजामी सिलसिले का प्रचलन हुआ और सूफी साहब के मुरीद अपने नाम के साथ निजामी उपनाम लिखते हैं। उनके उर्स को उर्से निजामी के रूप में जाना जाता है। उर्से निजामी के दौरान देश के विभिन्न प्रांतों महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, मध्यप्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार और खाड़ी देशों, अमेरिका और यूरोप में फैले उनके मुरीद बड़ी संख्या में उर्स में शामिल होने आते हैं।
श्रद्धालुओं के खाने की हुई व्यवस्था
उर्स में आने वाले श्रद्धालुओं के खाने के लिए विशेष प्रबंध किया गया था। आयोजन कमेटी के जिम्मेदारों ने बताया कि बड़ी संख्या में जायरीन विभिन्न प्रांतों और उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के जिलों से आते हैं। ऐसे में उनके खाने की व्यवस्था उर्स आयोजन कमेटी के जरिए की जाती है। इस बार करीब 20,000 लोगों के भोजन की व्यवस्था की गई थी।
शिक्षा पूरी कर चुके 44 छात्रों को दी जाएगी उपाधि
उर्स के दौरान दारुल उलूम अहले सुन्नत गौसिया रिजविया अगया से शिक्षा पूरी कर चुके 44 छात्रों को उपाधि देकर और उनके सिर पर पगड़ी बांधकर सम्मानित किया जाएगा। मौलाना जियाउल मुस्तफा निजामी ने बताया कि उर्स में मौजूद देश के प्रसिद्ध उलेमा के हाथों फजीलत कोर्स के सात, आलिमियत कोर्स के नौ, हिफ्ज में कोर्स के नौ, किरत कोर्स के 19 और कुल 44 छात्रों की दस्तारबंदी कर उन्हें सम्मानित किया जाएगा।
मेले में लगे झूले का बच्चों ने उठाया लुत्फ
उर्स के दौरान लगे मेले में आधा दर्जन से अधिक झूले लगे हैं। बड़ी संख्या में बच्चे झूले का आनंद लेते दिखे। झूलों के अतिरिक्त दूर-दराज शहरों से हलवा पराठा, खाजा, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां बनाने वाले कारीगर पहुंचे हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने इन मिठाइयों की खरीदारी की। इसके अतिरिक्त मजार पर चढ़ाने के लिए चादरों, फूल-मालाओं और बड़ी संख्या में खिलौनों की दुकानें मेले की रौनक बढ़ा रही हैं।