भूसे का विकल्प बना साइलेज, दुधारू पशुओं के लिए मुफीद
देवरिया के देवेंद्र मणि त्रिपाठी ने नौकरी छोड़कर शुरू किया साइलेज बनाने का काम
गोरखपुर, देवरिया, संतकबीरनगर और बिहार में डेयरी वालों को दे रहे सप्लाई
पशुपालन विभाग ने भी निराश्रित पशुओं को खिलाने के लिए मंगाया साइलेज
अमर उजाला ब्यूरो
संतकबीरनगर। भूसे की महंगाई के दौर में साइलेज पशुओं के चारे के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। स्वादिष्ट होने की वजह से पशु इसे चाव से खाते हैं। वहीं, पौष्टिक होने की वजह से दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता बढ़ जाती है। डेयरी और बकरी पालन से जुड़े लोगों के अलावा निराश्रित पशुओं को खिलाने के लिए पशुपालन विभाग भी साइलेज खरीद रहा है। पूर्वांचल में साइलेज बनाने का काम देवरिया जिले के रुद्रपुर के रहने वाले देवेद्र मणि त्रिपाठी ने शुरू कि या है।
देवरिया जिले के रुद्रपुर निवासी देवेंद्र मणि त्रिपाठी एमबीए डिग्रीधारी हैं। वह मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। इसी दौरान उनका पंजाब आना-जाना हुआ और साइलेज बनाने की विधि की जानकारी हासिल की। वर्ष 2020 में वह पंजाब से साइलेज मंगाते थे और उसकी आपूर्ति देवरिया, गोरखपुर, आजमगढ़ में करते थे। दिसंबर 2021 में उन्होंने उद्योग विभाग से छह लाख रुपये का ऋण लिया। पांच लाख रुपये की साइलेज बनाने की मशीन आगरा से मंगाई। ट्रैक्टर और पिकअप खरीदे। कुशीनगर के कसया में किसानों से करीब 25 एकड़ मक्का की फसल खरीदे और साइलेज बनाने का कार्य शुरू किए। भूसे की महंगाई और पशुओं के चाव से खाने की वजह से साइलेज की मांग बढ़ गई है। भूसे में मिलाने के लिए जहां हरे चारे की जरूरत होती है, वहीं साइलेज में मिलाने के लिए हरे चारे की जरूरत नहीं पड़ती है। यह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। इसे पशु चाव से खाते हैं।
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मक्का व गन्ने की फसल और नेपियर घास मिलाकर बनता है साइलेज
देवेंद्र मणि त्रिपाठी गोरखपुर के महावीरपुर में किराए के मकान में परिवार सहित रहते हैं। वह मक्का, गन्ना, नेपियर घास आदि से साइलेज बनाते हैं। प्रति एकड़ मक्का 28,000 रुपये में खरीदते हैं, जिसमें प्रति एकड़ 6,000 रुपये का मुनाफा होता है। पिछले वर्ष वह बस्ती में करीब 25 एकड़ गन्ने की फसल खरीदे थे। बताते हैं कि भूसे की कीमत प्रति किलोग्राम नौ रुपये से लेकर साढ़े नौ रुपये है। जबकि साइलेज सात रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है।
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छह लोगों को दिया है रोजगार
गोरखपुर, देवरिया, गोपालगंज, संतकबीरनगर और आजमगढ़ में डेयरी उद्योग से जुड़े लोगों को आपूर्ति देते हैं। बिहार के गोपालगंज और गोरखपुर के कैंपियरगंज में मुर्गी पालन करने वाले बड़े कारोबारियों को भी साइलेज बेचते हैं। इस कारोबार से उन्होंने छह लोगों को रोजगार दिया है। प्रत्येक महीने साइलेज बेचकर 50,000 रुपये की आमदनी कर लेते हैं।
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दुधारू पशुओं के लिए साइलेज बेहतर
साइलेज की खासियत यह है कि इससे पशुओं को हरे चारे की जरूरत नहीं पड़ती है। जानवर की सेहत भी अच्छी रहती है। पशुओं में दूध देने की क्षमता बढ़ती है। डेयरी वाले लोग भूसे की महंगाई की वजह से जानवरों की संख्या घटा रहे थे। साइलेज ने उन्हें बड़ी राहत दी है। ऐसे जानवर जो 20 से 22 लीटर दूध देते हैं, उन्हें प्रतिदिन 15 किलोग्राम साइलेज खिलाना होता है। शेष जानवर को प्रतिदिन सात से आठ किलोग्राम साइलेज खिलाया जाता है।
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किसानों को होती है कमाई
देवेंद्र मणि त्रिपाठी ने पांच एकड़ में नेपियर घास लगाई है। फैजाबाद के नवाबगंज में 20 एकड़ मक्का की फसल खरीदे हैं। वह साइलेज बनाने की बड़ी मशीन खरीदना चाहते हैं। साइलेज बनाने के पीछे उनका उद्देश्य किसानों को मुनाफा देना। किसान अपने खेत में साल में तीन बार मक्का उगा सकते हैं। साथ ही अन्य फसल भी उगा सकते हैं। किसानों से वह मक्का खरीद कर उन्हें नकद भुगतान करते हैं।
कोट
भूसे में सेलूलोज, हेमीसेलूलोज एवं लिग्निन पाया जाता है। भूसे में किसी प्रकार का पौष्टिक तत्व नहीं मिलता है, जबकि साइलेज में सात से आठ प्रतिशत प्रोटीन, मिनरल और विटामिन पाया जाता है। साइलेज पशुओं के लिए स्वादिष्ट होता है। इससे दुधारू पशुओं में दूध देने की क्षमता बढ़ती है। भूसे की महंगाई को रोकने में साइलेज विकल्प बन गया है। जिले में निराश्रित पशुओं को खिलाने के लिए दस टन साइलेज की मांग देवेंद्र मणि त्रिपाठी से की गई है।
- डॉ. ओपी मिश्रा, प्रभारी पशु चिकित्साधिकारी