संतों के आगमन से धरती पवित्र हो जाती है। संत कबीर मगहर में करीब तीन साल तक रहे। ऊसर, बंजर तथा अभिशप्त मानी जाने वाली यह धरती कबीर के आगमन से खिल उठी। कबीर साहेब के आमंत्रण पर नाथ पीठ के सिद्ध पुरुष भी यहां पधारे थे। उनके प्रभाव से यहां का तालाब जल से भर गया। वे सच्चे पीर थे। वे लोगों की पीड़ा समझते थे और उस पीड़ा को दूर करने के उपाय करते थे। ये बातें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को मगहर के कबीर चौरा परिसर में आयोजित कार्यक्रम में कहीं।
‘साहेब बंदगी’ से संबोधन की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि कमजोर लोगों के प्रति संवेदना और असहायों की सेवा किए बगैर समाज में समरसता नहीं आ सकती। यह मार्ग संत कबीर ने बताया है। वे पूरे जीवन सांप्रदायिक एकता का संदेश देते रहे। एक ही परिसर में उनकी समाधि व मजार का होना सांप्रदायिक एकता की दुर्लभ मिसाल है।
राष्ट्रपति ने कहा कि माना जाता था कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मृत्यु होने से नरक मिलता है। संत कबीर इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए काशी से मगहर आए। मगर में लोग अकाल से त्रस्त थे। कबीर साहेब मगहर पहुंचे और लोगों का जीवन संवारने का काम किया। संत कबीर सच्चे पीर थे। उन्होंने कहा भी है, ‘कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर।’ संत कबीर ने अपनी वंचनाओं को कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। वह कपड़ा बुनने का काम करते थे। अच्छा कपड़ा बुनने के लिए सूत की कताई, रंगाई तक बहुत सावधानी और सजगता की जरूरत होती है। उन्होंने विभाजित समाज में समरसता लाने के लिए सामाजिक मेलजोल की बारीक कताई की, ज्ञान के रंग से सुंदर रंगाई की, एकता व समन्वय का मजबूत ताना-बाना तैयार किया और समरस समाज के निर्माण की चादर बुनी। इस चादर को उन्होंने बहुत ही सावधानी से ओढ़ा और कभी मैला नहीं होने दिया। कहा जाता है, ‘दास कबीर जतन ते ओढ़ी, ज्यूं की त्युं ज्यों धर दिनी चदरिया।’
संत साहेब ने समानता का मार्ग दिखाया
राष्ट्रपति ने कहा कि संत कबीर ने समानता व समरसता का मार्ग दिखाया। गृहस्थ जीवन में भी वह संतों की तरह जीवन जीते रहे। पुस्तकीय ज्ञान से वंचित रहे पर साधु संगति के ज्ञान व अनुभव से उनके द्वारा प्रतिपादित शिक्षाएं 600 वर्ष बाद आज भी आमजन व बुद्धिजीवियों में एक समान लोकप्रिय हैं। उस समय आक्रांताओं के आक्रमण से लोग त्रस्त थे। ऐसे में प्रेम व मैत्री का संदेश देने के लिए उन्होंने लोगों से सीधा संवाद किया। कभी-कभी ठेठ शब्दों का भी प्रयोग किया, जो तब की परिस्थितियों के अनुसार बहुत जरूरी भी था। संत कबीर ने पहले समाज को जगाया और फिर चेताया। इसके पूर्व राष्ट्रपति ने कबीर की समाधि और मजार पर मत्था टेका।
49 करोड़ की परियोजनाओं का किया लोकार्पण
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंच से बटन दबाकर संत कबीर की साधना एवं निर्वाण स्थली मगहर में 31.49 करोड़ रुपये की लागत से बने संतकबीर अकादमी एवं शोध संस्थान, स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत 17.61 करोड़ रुपये की लागत वाले इंटरप्रेटेशन सेंटर का लोकार्पण किया। इस अवसर पर 37.66 लाख रुपये की लागत से कराए गए कबीर निर्वाण स्थली के सौंदर्यीकरण कार्यों का भी लोकार्पण हुआ।