संसाधन उपलब्ध न सुरक्षा के इंतजाम
बरदहिया बाजार के व्यापारियों को झेलनी पड़ रही है परेशानी
संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। पूर्वांचल की सबसे बड़ी कपड़ा मंडी के रूप में प्रसिद्ध बरदहिया बाजार की स्थिति काफी दयनीय है। यहां न तो संसाधन उपलब्ध हैं और न ही सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम ही हो सका है। इससे यहां कारोबार करने वाले व्यापारियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दो दिन पूर्व बरदहिया बाजार में गोदाम में कपड़ों के गठ्ठर में लगी आग से करीब एक करोड़ की क्षति हुई।
जनपद मुख्यालय खलीलाबाद स्थित पूर्वांचल की प्रमुख कपड़ा मंडी बरदहिया बाजार की रौनक फीकी पड़ रही है। स्थानीय उत्पाद को छोड़कर बाहरी उत्पाद से बाजार सज रहे हैं। यहां व्यापारियों के लिए न तो बैठने के लिए मुकम्मल इंतजाम है और न ही सामान रखने आदि का समुचित प्रबंध। पेयजल, सुलभ शौचालय व छायादार, चबूतरा आदि की व्यवस्था भी नहीं है। इससे व्यापारियों व ग्राहकों को दुर्गति झेलनी पड़ रही है। सुरक्षा के अभाव में हर समय खतरे की आशंका बनी रहती है। अभी दीपावली के एक दिन बाद यहां आग लगने की घटना हुई, लेकिन आग से बचाव के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। सूचना पर पहुंची फायर ब्रिगेड की चार गाड़ियां पांच घंटे अथक प्रयास के बाद आग बुझा पाईं। इस घटना में 12 से अधिक व्यापारियों के करीब एक करोड़ कीमत के ऊनी कपड़े जल गए। शहर में करीब तीन एकड़ के विस्तार में फैली बरदहिया बाजार कपड़ा मंडी की स्थापना वर्ष 1935 में हुई थी। शुरुआती दौर में यहां कुछ टीनशेड की व्यवस्था तो कराई गई, लेकिन परिसर में बुनियादी जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सप्ताह में शनिवार की रात से ही बाजार सजनी शुरू हो जाती है और सोमवार को दोपहर तक लगती है। मंडी के अधिकांश हिस्सों में कीचड़ व जलभराव की स्थिति बनी रहती है। पॉवरलूमों की स्थिति खराब होने व उपेक्षा के चलते बड़े पैमाने पर होने वाला वस्त्र उत्पादन ठप पड़ गया। वर्तमान में बाहरी उत्पाद से दुकानें सज रहीं हैं और स्थानीय कारीगर रोटी के मोहताज बने हुए हैं। व्यवसायी मुकेश कुमार, दिलीप कुमार, अतीकुर्रहमान आदि ने बताया कि सड़क पर खुले में इंतजाम कर दुकान लगानी मजबूरी है।
सूती कपड़ों से बाजार की पहचान
पशुओं के बाजार के लिए कभी चर्चित रहा खलीलाबाद का बरदहिया बाजार अब सूती कपड़ों की मंडी के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। हैंडलूम निर्मित यहां के सूती कपड़ों में लुंगी, धोती, गमछा की मांग रहती है। सूती कपड़ों के साथ यहां अब रेडीमेड कपड़े, जींस, पैंट, शर्ट, जैकेट, सूट, साड़ी, चादर, स्वेटर, मफलर आदि की सैकड़ों की संख्या में दुकानें सजती हैं। करीब 70 वर्षों से यहां प्रत्येक मंगलवार को पशुओं का बाजार लगता रहा, मगर एक दशक पूर्व पशुओं का बाजार बंद हो गया। वर्तमान में यहां कपड़े का बाजार ही लगता है।
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अन्य प्रांतों से आते रहे हैं व्यापारी
पहले यहां असाम, बंगाल, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब से व्यापारी आते रहे हैं। तब यहां छह से अधिक आढ़तिया काम करते थे। अब उनकी संख्या कम हो गई है। अन्य जगहों के थोक व्यापारी सूती कपडे़ की खरीदारी करते हैं। माल देखकर आढ़तियों के मार्फत लुंगी, गमछा, खादी के कुर्ता पैजामे के थान की गुणवत्ता के अनुसार बुकिंग करते हैं। बडे़ लूम के व्यवसायी अथवा आढ़तिया गांठ बनाकर उनके पास भेज देते हैं। हुंडी बिल्टी की बजाय अब तो माल भेजने के बाद खाते में पैसा तुरंत आ जाता है।
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बरदहिया बाजार में संसाधन उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें पेयजल, शौचालय आदि शामिल हैं। जाम की समस्या से निपटने के लिए सड़क के किनारे लगने वाली दुकानों को नालियों के पीछे कराया गया है। बाजार मालिक से सुविधाओं के बारे में कदम उठाने के लिए कहा गया है।
-सुरेश मौर्य, ईओ