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धरातल पर नहीं सिर्फ कागजों में बढ़ रही हरियाली, प्रभावी रणनीति बने तो सुधरे जिले का पर्यावरण

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धरातल पर नहीं सिर्फ कागजों में बढ़ रही हरियाली, प्रभावी रणनीति बने तो सुधरे जिले का पर्यावरण
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हर साल रोपे जा रहे पौधे, पर देखरेख के अभाव में नहीं बन रहे पेड़, जियो टैगिंग भी फेल
संवाद न्यूज एजेंसी
संभल। पर्यावरण की शुद्घता के लिए तमाम दावे होते हैं और हर साल बड़ी संख्या में पौधे रोपे जाते हैं, लेकिन परियोजनाएं कागजों तक सिमटी रहती हैं। प्रभावी रणनीति न होने से योजनाएं धड़ाम हो जाती हैं, यही वजह है कि वर्ष-2020 के बाद जियो टैगिंग से भी लगाए गए पौधे पेड़ नहीं बन पा रहे हैं। वन क्षेत्र कम होने और पानी की समस्या से दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीवों के सामने अस्तित्व का संकट है। प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ रहा है। जिले में पर्यावरण संरक्षण को लेकर होने वाले प्रयासों को बेहतर करने की आवश्यकता है, तभी जिले का पर्यावरण शुद्ध हो पाएगा।
विश्व पर्यावरण दिवस और इसके बाद वन महोत्सव के दौरान इस वर्ष भी संभल जिले को 24,76,039 पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग को 3 लाख और बाकी 24 लाख से ज्यादा पौधे अन्य विभागों को लगाने हैं। पिछली बार की तुलना में जिले में करीब चार लाख पौधों की बढ़ोत्तरी हुई है। आने वाले दिनों में यह पौधे पेड़ बनेंगे या नहीं, यह सवाल बना हुआ है। बीते वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष-2019 के मध्य 17.67 लाख पौधे, वर्ष 2020-21 में 17.98 लाख और वर्ष 2021-22 में 23.58 लाख पौधे लगाए गए। हैरानी की बात यह है कि तीन साल में करीब 59 लाख पौधे लगाए, बावजूद इसके धरातल पर कहीं हरियाली नहीं दिख रही।
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इनसेट
सड़कों के चौड़ीकरण में 78 और 11 पुराने पेड़ हुए धराशायी
-वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2021-22 में सड़कों के चौड़ीकरण, निर्माण आदि कार्यों के लिए जनपद में 78 पेड़ धराशायी कर दिए गए। वन निगम ने इन्हें धराशायी किया, जो वन विभाग की ही एक इकाई है।
वर्ष-1995 तक बड़े रकबे में फैला था वन्य क्षेत्र
संभल। सेंतुआ गांव के निवासी करीब 90 वर्षीय भूप सिंह यादव बताते हैं कि वर्ष-1995 तक के दौर में कई-कई किलोमीटर तक वन क्षेत्र हुआ करते थे। कैला देवी से भिरावटी तक के बड़े क्षेत्रफल में वन क्षेत्र था। मुकुटपुर, गुरैठा, रझावली, सिंघौली, खजरा, सलेमपुर, रोरादीप, मारकपुर, सेंतुआ में ढाका के पेड़ हुआ करते थे, जिनके दो फायदे थे। एक हरियाली और दूसरा पत्तों की पत्तलें बना करती थीं, जो शादी ब्याह में काम आती थीं। लेकिन 2000 के बाद से पट्टे होते चले गए और वन्य क्षेत्र घटता चला गया। जिला अर्थ एवं सांख्यिकी अधिकारी महेंद्र पाल के अनुसार वर्तमान में जनपद में सिर्फ गुन्नौर, रजपुरा और जुनावई में कुल 232 हेक्टेयर वन क्षेत्र है।
विशेष
वर्ष-2019 में सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ काटने के विरोध में हुआ था नया चिपको आंदोलन
संभल। बरसों पुराने 400 पेड़ों की रक्षा के लिए संभल के 20 गांवों के लोगों ने वर्ष-2019 मेंमिनी चिपको आंदोलन की राह अख्तियार कर ली थी। बावजूद इसके पेड़ नहीं बच पाए। बाद में प्रशासन ने उन्हें कटवा दिया। दरअसल, कैला देवी मंदिर के आसपास खाली जमीन पर करीब बीस बीघा जमीन में पाकड़, बरगद, पिलखन आदि के लगभग चार सौ पेड़ लगे हुए थे। यह स्थान झाड़ी वाला जंगल के नाम से मशहूर है। मंदिर होने के कारण लोगों का जुड़ाव यहां से बना हुआ है। इस जंगल में आठ दस पेड़ ऐसे सैकड़ों वर्ष पुराने थे हैं लेकिन गौशाला बनाने के लिए इन्हें काट दिया गया।
कोट
कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन का जो हाहाकार मचा, उससे लोगों को पीपल, बरगद, पाकड़, नीम, तुलसी आदि ऐसे पौधों की याद आ गई, जो 20 से 22 घंटे तक ऑक्सीजन देते हैं। पौधरोपण का एक लक्ष्य होता है। वन विभाग अपने लक्ष्य को 90 फीसदी तक पूरा कर लेता है। वायुमंडल में 21 प्रतिशत ऑक्सीजन और 33 प्रतिशत भूभाग पर वन क्षेत्र होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। हमें वन क्षेत्र बढ़ाना होगा। मजबूत नीतियां बनानी होंगी। यदि वायुमंडल में ऑक्सीजन 11 प्रतिशत से कम रह गई तो जीवन संकट में आ जाएगा।
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नैपाल सिंह पाल, पर्यावरण सचेतक।
कोट
पौधरोपण को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। जिले में इस बार 24.76 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। विश्व पर्यावरण दिवस से पौधे लगाने की शुरूआत हो जाएगी, लक्ष्य पूरा होने तक यह प्रक्रिया चलेगी। जिले का पर्यावरण सुधारने के लिए इस बार व्यापक प्रयास किए जाएंगे।
अरविंद कुमार, डीएफओ, संभल।
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