सहारनपुर। मातृभाषा हिंदी को पुष्पित पल्लवित होते देखने का सपना संजोने वाले वैद्य रतनलाल चातक का जीवन हिंदी साहित्य और राष्ट्रप्रेम के लिए समर्पित रहा। भाषा और साहित्य के मोर्चे पर अलख जगाते हुए जीवन पर्यंत वह हिंदी जागरण अलख जगाते रहे। 1922 में उन्होंने ही सहारनपुर में पहली बार तिलक पुस्तकालय लालता प्रसाद मार्ग पर हिंदी कवि संगोष्ठी का आयोजन कराया, साथ ही हिंदी साहित्य की संस्थाओं की भी स्थापना की।
साहित्यिक संस्था समन्वय द्वारा उन पर प्रकाशित पुस्तक क्या याद तुम्हें भी आता हूं, में उनके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। वैद्य रतनलाल चातक का जन्म 1901 में जन्माष्टमी पर पंडित राधेलाल मिश्र के घर हुआ था। उस समय इनका परिवार देवबंद में रहता था। तब देवबंद में वर्ष 1911 में हुए दंगे के दौरान राम सीता की मूर्तियों की रक्षा करते समय उन पर हमला हुआ, जिसमें उनका निधन हो गया था। इसके बाद वैद्य रतनलाल चातक ने आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया और कई बार जेल तक गए। इसी बीच हिंदी का पौधा रोपने की ललक के साथ साहित्य साधक रतनलाल चातक ने मुशायरों के रूप रंग से प्रभावित होकर 1922 में पहली बार हिंदी कवि संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने कुछ साथियों सहित हिंदी साहित्य समाज की स्थापना भी की। फिर 1926 में हिंदी हितैषिणी सभा और 1929 में इसका नाम हिंदी साहित्य समिति कर दिया। अगस्त 1935 तक हिंदी साहित्य समिति के रूप में यह संस्था कार्य करती रही और इसके बाद इसे हिंदी मित्र मंडल नाम दिया गया। वैद्य रतनलाल चातक ने कई काव्य रचनाएं कीं, जो लंबे समय तक लोगों के दिलो दिमाग पर छाप छोड़े रही। 26 अक्तूबर 1979 को वैद्य रतनलाल चातक का निधन हो गया था।
हृदय, उठ चल, ले चल उस ओर
वैद्य रतनलाल चातक की सबसे पुरानी कविता 1928 की है। तब हिंदी काव्य का परिवेश पूर्णत: छायावादी, भावुकता और कल्पना लोक से आच्छादित था। यह तत्कालीन युग की प्रवृत्ति थी। अपने समय की प्रवृति से रचनाकार का प्रभावित होना स्वाभाविक था। उस कविता में रतनलाल चातक ने लिखा था हृदय, उठ चल, ले चल उस ओर, जहां पर गूंज रही हो तान, अधर पर रह रह मृदु मुस्कान, देख आता जाता छविमान, बिछाकर नयन करे सम्मान जहां अंतर्हित हो चित चोर, हृदय उठ चल ले चल उस ओर।
उनकी एक अन्य कविता में उन्होंने लिखा, क्या याद तुम्हें भी आता हूं, तुम दूर यहां से बहुत दूर, खेतों नदियों से पार सखे, मैं दूर देश की दुनिया में, हूं बेबस और लाचार सखे, मन दुखता है अकुलाता हूं, क्या याद तुम्हें भी आता हूं।
जब कलक्टर को दिया जवाब
पुस्तक में साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का भी संस्मरण शामिल है, जिसमें लिखा कि वैद्य रतनलाल चातक जेल में थे। तब एक दिन कलक्टर कुक जेल आया और चातक जी से पूछा कि आपको किस चीज की जरूरत है। इस पर चातक जी जोर से बोले, थैंकस किलट्टर साब। कलक्टर कुक ने पूछा यह क्या कहा, इस पर चातक जी बोले, यह अंग्रेजी का हिंदी उच्चारण है।