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छह दिन की जद्दोजहद के बाद रामपुर पहुंची शजा

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रामपुर। यूक्रेन के खारकीव में फंसी रामपुर की शजा उस्मान छह दिन की जद्दोजहद करने के बाद रविवार को अपने घर पहुंच गईं। परिवार के सदस्यों ने शजा उस्मान को अपनी आंखों के सामने देखा, तो वो खुश हो गए। शजा ने बताया कि यूक्रेन और पोलैंड के बॉर्डर पर यूक्रेन के नागरिकों को निकालने में प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि विद्यार्थियों को बर्फबारी के बीच घंटों इंतजार करना पड़ता है।
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अठभैयान घेर सैफुद्दीन निवासी शजा उस्मान नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी खारकीव से एमबीबीएस कर रही हैं। यह उनका तीसरा साल है। वह खारकीव में ही फंसी हुईं थीं। उन्होंने बताया कि भारतीय दूतावास से एडवाइजरी जारी होने के बाद एक मार्च को वह हॉस्टल के बंकर से बाहर निकलीं और कैब की तलाश करने लगीं। कैब नहीं मिलीं तो सात किलोमीटर तक रेलवे स्टेशन के लिए पैदल ही निकल गईं। उनके पैर में मोच थी। स्टेशन पर साढ़े तीन घंटे तक इंतजार करने के बाद लवीव के लिए ट्रेन मिली। ट्रेन में बहुत भीड़ थी।
22 घंटे का सफर करने के बाद लवीव पहुंचीं और फिर कैब से पोलैंड बॉर्डर के लिए रवाना हो गईं। उन्होंने बताया कि कैब ने तीन किलोमीटर पहले ही उतार दिया, जिसके बाद वह फिर पैदल ही बॉर्डर तक पहुंचीं। उसने बताया कि बॉर्डर के हालात बहुत खराब थे। बर्फबारी हो रही थी। वहां सात सौ भारतीय छात्र छात्राएं मौजूद थे, लेकिन पहले यूक्रेन के नागरिकों को बॉर्डर पार कराया जा रहा था। साढ़े ग्यारह घंटे इंतजार करने के बाद उन्हें पोलैंड में प्रवेश मिला। इसके बाद वह आर्ट ऑफ लिविंग के कैंप पहुंचकर और एक दिन वहां व्यतीत किया। इसके बाद, भारतीय दूतावास के कर्मचारी एक दूसरे शहर में ले गए, जहां सात बजे दिल्ली और दोपहर तीन बजे रामपुर पहुंची। उन्होंने बताया कि वहां के हालात बहुत खराब हैं। चारों तरफ बमबारी हो रही है। उसने बताया कि अब अपने परिवार के बीच पहुंचकर काफी खुश हूं। वहीं, हंगरी में फंसे रामपुर के आशीष राजपूत भी स्वदेश लौट आए हैं। उनकी फ्लाइट मुंबई उतरी थी, जहां से वे दिल्ली आएंगे और फिर रामपुर। उनके पिता सतीश ने बताया कि वह उन्हें लेने के लिए दिल्ली रवाना हो गए हैं।
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