हुसैन की शहादत पर चीख पड़े थे जमीन और आसमान
शाहबाद (रामपुर)। जो जुल्म और सितम यजीद और उसके साथियों ने खानदाने रसूल पर किए, शायद ही कोई भूल सकता है। कर्बला में शहीद नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन के कटे हुए सर की तिलावात को देखकर लोग हैरान रह गए। जब यजीदियों ने इमाम हुसैन के बेटे नन्हे अली असगर को भी कत्ल कर दिया था और ये मुहर्रम का पूरा महीना बहुत कुछ याद दिलाता है।
पटवाई के इमामबाड़े वाली मस्जिद के इमाम एवं मुफ्ती वसीम रजा खान ने बताया कि मुहर्रम की दस तारीख में अल्लाह की तरफ से कई वाकियात ऐसे हुए है। जिसमें दस तारीख को आज भी याद किया जाता है। इसी मुहर्रम की दस तारीख को अल्लाह ताला ने हजरत आदम अलेहहिस्सलाम और हजरत दाऊद की तोबा को कबूल किया था। हजरत इद्रीस को मकामे बुलंद की तरफ उठाया। हजरात इब्राहीम की विलादत हुई। हजरत याकूब की रौशनी वापस आई। हजरत युनुस को मछली के पेट से निकाला गया। हजरत मूसा सलामती से दरिया पार हुए और फिरोंन दरिया में डूब गया। हजरत इसा अलेहिससलाम को असमान की तरफ जिंदा उठाया गया और इसी तारीख में कयामत भी आएगी। इसी तारीख में नवासा-ए-रसूल इमाम हुसैन अपने नाना के दीन को बचाने के लिय तीर, नैजा, तलवार के बहत्तर जख्म खाकर 56 साल पांच महीने, पांच दिन की उम्र में जुमा के दिन 61 हि0 मुताबिक सन 680 को शहीद हो गए। हजरत इमाम हुसैन की शहादत अल्लाह की बारगाह में ऐसे कबूल हुई कि यह तारीख उनकी शहादत से मशहूर हो गई। क्योंकि, जब याजीदयों ने इमाम हुसैन को शहीद किया था। तब इंसान ही नहीं बल्कि जमीन आसमान ने भी आंसू बहाए थे। इतने पर भी जब यजीदियों का कलेजा ठंडा नहीं हुआ, तब यजीदियों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों की लाशो पर घोड़े दौड़ाए थे। इसी जंग के दौरान जब नन्हे अली असगर को प्यास लगी थी। तब हजरत इमाम हुसैन ने यजीदियों के फौज से पानी मांगा था, लेकिन याजीदियों ने पानी न देकर नन्हे अली असगर के हलक में तीर मारा और वे तीर हजरत इमाम हुसैन के बाजू में जा लगा और अल्लाह ने नन्हे अली असगर की कुर्बानी को कबूल कर शहीद का दर्जा दिया।