कोरोना से मिली राहत के बाद अब वायरल ने हमला कर दिया है। वायरल से पीड़ित बच्चों को निमोनिया जकड़ रहा है। परिजनों की जरा सी लापरवाही भी मासूमों पर भारी पड़ जा रही है। उनकी हालत बिगड़ जा रही है। निमोनिया पीड़ित बच्चों की संख्या बढ़ने से एसएनसीयू में बेड कम पड़ जा रहे हैं। बड़े बच्चों को भर्ती कर इलाज करने के लिए मेडिकल कॉलेज में आईसीयू की व्यवस्था नहीं है। बुखार के साथ सर्दी-जुकाम और सांस लेने में तकलीफ होने क कारण डॉक्टरों को उन्हें प्रयागराज रेफर करना पड़ रहा है।
मेडिकल कॉलेज की महिला विंग में महज 14 बेड का एसएनसीयू है। पुरुष विंग में आईसीयू की व्यवस्था नहीं है। जबकि इन दिनों मौसम में बदलाव के चलते बच्चे तेजी से वायरल फीवर और निमोनिया की चपेट में आ रहे हैं। उन्हें सर्दी-जुकाम और बुखार के साथ सांस लेने में तकलीफ हो रही है। ऐसे बच्चों का लोग पहले झोलाछापों से इलाज करा रहे हैं। हालत बिगड़ने पर मेडिकल कॉलेज पहुंच रहे हैं। यहां ओपीडी में बैठे डॉक्टरों बच्चों को देखते ही 12 माह तक के बच्चों को एसएनसीयू में भर्ती करा रहे हैं।
ज्यादा उम्र के बच्चों को मेडिकल वार्ड में रखकर इलाज किया जाता है। यहां आईसीयू की व्यवस्था नहीं है। जरूरत पड़ने पर सिर्फ ऑक्सीजन दी जाती है। हालत में सुधार न होने पर बच्चों को एसआरएन रेफर कर दिया जाता है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल गुप्ता ने बताया कि निमोनिया पीड़ित बच्चों के मामले में उनके माता-पिता की लापरवाही सामने आ रही है। हालत गंभीर होने के बाद वे बच्चों को मेडिकल कॉलेज ला रहे हैं।
इसके पहले स्थानीय अप्रशिक्षित डॉक्टरों से इलाज कराते हैं। जीवनरक्षक टीके न लगवाने के कारण भी बच्चों की हालत बिगड़ रही है। उन्होंने बताया कि फ्लू के टीके लगवाने से बुखार ही नहीं कई अन्य बीमारियों से भी छुटकारा मिल जाता है। निमोनिया पीड़ित बच्चों के इलाज में जरा सी भी चूक जान पर भारी पड़ सकती है। बच्चों को सर्दी-जुकाम और बुखार के साथ सांस लेने में तकलीफ होने पर तत्काल चिकित्सक को दिखाएं।