जिले के अधिकांश महाविद्यालयों में अभी तक पुस्तकालयों की स्थापना ही नहीं हो सकी है। ऐसे में यूजीसी और शासन के गुणवत्तापरक शिक्षा देने के दावे बेमानी साबित हो रहे हैं। वहीं छात्र-छात्राओं के अध्ययन के लिए पाठ्य पुस्तकों एवं अन्य अध्ययन सामग्री के लिए अभिभावकों को अपनी जेबें ढीली करनी पड़ रही हैं।
जिले में चार राजकीय व सात अनुदानित समेत कुल 159 महाविद्यालय हैं। कुछ कॉलेजों में ही पुस्तकालयों की स्थापना की गई है। करीब 80 महाविद्यालय ऐसे हैं, जहां पुस्तकालय हैं ही नहीं। पुस्तकालय के नाम पर छात्र-छात्राओं से महाविद्यालयों द्वारा 50 रुपये फीस की वसूली जा रही है, लेकिन उन्हें कभी किताबें नहीं मुहैया कराई जाती। पुस्तकालय न होने की वजह से उन्हें अध्ययन सामग्री व पाठ्य पुस्तकें नहीं मिल पा रही हैं।
खास बात यह है कि जिन महाविद्यालयों में पुस्तकालयों की स्थापना की गई है, वहां लाइब्रेरियन नहीं हैं। जिससे पुस्तकों का रखरखाव एवं भंडारण समुचित ढंग से नहीं हो पाता। साथ ही पुस्तकालय संचालन में भी समस्या हो रही है। वहीं, छात्र-छात्राओं का दावा है कि व्यवस्थित रखरखाव न होने के कारण लाइब्रेरी के कर्मचारी उन्हें पुस्तकें उपलब्ध नहीं करा पाते हैं। खास बात तो यह है कि ढांचागत पुस्तकालय न होने के बावजूद महाविद्यालयों को मान्यता भी आराम से मिल गई है।
पुस्तकालय हैं, किताबें नहीं
राज्य विश्वविद्यालय ने इस बार नए सत्र से बीए, बीएससी, बीकॉम के साथ परास्नातक और प्रोफेशनल कोर्स के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया है। जिन कॉलेजों में पुस्तकालय हैं वहां बदले हुए पाठ्यक्रम की किताबें उपलब्ध नहीं हैं। मजबूरी में छात्र-छात्राओं को बाजार से पाठ्य सामग्री खरीदनी पड़ रही है। वहीं, कॉलेज संचालकों का कहना है कि बदले हुए पाठ्यक्रम की पुस्तकें प्रकाशित नहीं हो पाई हैं। जिससे पुस्तकालय में किताबें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
महाविद्यालयों को अपने पुस्तकालय अपडेट रखने के लिए कहा गया है। आवश्यकता के अनुरूप पाठ्य पुस्तकों की उपलब्धता और लाइब्रेरियन की तैनाती जरूरी है।
एसके शुक्ल, कुलसचिव, राज्य विश्वविद्यालय