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26 साल में इंसाफ : तारीख पर तारीख...विश्वास पर धूल के समान

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मुजफ्फरनगर। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने लिखा कि न्याय केवल निर्णय की अंतिम पंक्तियों में नहीं, बल्कि उस यात्रा के प्रत्येक क्षण में जीवित रहता है, जो किसी पीड़ित को सत्य से न्याय तक ले जाती है। जब यह यात्रा अनावश्यक रूप से लंबी हो जाती है, तो प्रतीक्षा स्वयं एक दंड का रूप ले लेती है। जिस व्यक्ति ने न्यायालय का द्वार इस विश्वास के साथ खटखटाया कि यहां उसके सत्य को आवाज मिलेगी, उसके लिए वर्षों तक चलती हुई तारीखें उस विश्वास पर धीरे-धीरे पड़ती हुई धूल के समान है।
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अदालत ने 41 पेज के फैसले में लिखा कि जब किसी बेकसूर की सांसों को फिरौती की शर्तों से बांध दिया जाता है। हत्या कर दी जाती है, तब न्यायालय का मौन भी अन्याय बन जाएगा। न्यायालय इस तथ्य से आंखें बंद नहीं कर सकता कि प्रत्येक हत्या केवल एक व्यक्ति के जीवन का अंत नहीं करती, बल्कि उसके साथ जुड़े परिवार को गहरे दुख, असुरक्षा और आजीवन पीड़ा में धकेल देती है।
न्यायालय का दायित्व समाज के हितों का संरक्षण करना भी होता है। जब लोभ मनुष्य की अंतरात्मा पर अधिकार कर लेता है, तब संवेदनाएं मौन हो जाती है और मानवता दम तोड़ देती है। सालिम की हत्या सभ्य समाज के नैतिक मूल्यों पर निर्मम प्रहार है।
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धन का मूल्य कभी भी मानव जीवन से अधिक नहीं हो सकता। न्यायालय मौन रखकर ऐसे मामलों को सामान्य नहीं बनने दे सकता, न्याय का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज के विश्वास की रक्षा करना है।
किसी परिवार का चिराग बुझाना सरल हो सकता है, पर उस घर में छा जाने वाले अंधकार को कोई दंड समाप्त नहीं कर सकता। सालिम की हत्या अपराध की उस पराकाष्ठा का उदाहरण है, जहां लोभ, क्रूरता और अमानवीयता एक साथ दिखाई देते हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय का प्रत्येक शब्द कानून की गरिमा और समाज की अंतरात्मा का प्रतिनिधित्व करता है।
अदालत में धन की नहीं, जीवन की गरिमा सर्वोपरि होती है। हत्या योजना बनाकर की गई, इसकी सजा मृत्युदंड है। यह ठंडे दिमाग से की गई हत्या को दर्शाता है। सालिम की हत्या में न्यूनतम दंड ही मृत्युदंड है। किसी को सजा देने या फैसला करने का हक न्यायालयों को है, किसी अपराधी को नहीं।
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यह ठंडे दिमाग से किया गया अपराध
मुजफ्फरनगर। अदालत ने लिखा कि ऐसी घटनाओं से लोगों का राज्य सरकार के शासन से भरोसा उठ जाता है और लोग यह सोचने लगते हैं कि जब राज्य सरकार उनकी जान-माल की रक्षा नहीं कर सकती तो कर और कानून का क्या फायदा। फिरौती के लिए किसी का अपहरण करना और फिर उसकी हत्या कर देने का अपराध अचानक गुस्से में नहीं किया जाता है बल्कि पूरी योजना, ठंडे दिमाग और आर्थिक लालच के लिए किया जाता है। न्यायपालिका का यह अंतिम सामाजिक कर्तव्य है कि वह ऐसे क्रूर मामलों में नजीर पेश करने वाले फैसले सुनाए जिससे अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा हो और आम नागरिकों में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत हो। ब्यूरो
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