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पर्यावरण संरक्षण: गोबर कं दीये

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मुरादाबाद। इस बार दीपावली पर बहुत से घरों में मिट्टी के नहीं, बल्कि गोबर से बने दीये जगमगाएंगे। श्री भगवती गौ सेवा एवं पुनर्वास केंद्र में 22 महिलाएं गोबर के दीये बना रही हैं। दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर यह महिलाएं अपने हुनर से सबको चकित कर रही हैं। वह दीयों के अलावा लक्ष्मी-गणेश की गोबर की मूर्तियां भी तैयार कर रही हैं। दीपावली के बाद इन दीयों का उपयोग गोबर की खाद के रूप में किया जा सकेगा, इससे धरती से पर्यावरण स्वच्छ बनाने वाली सुगंध उठेगी।
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गोबर से दीया और लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति बनाने से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहीं महिलाओं ने इसे अब आजीविका का साधन बना लिया है। दो शिफ्टों में करीब 22 महिलाएं दीये और मूर्तियों को बनाने के कार्य में लगी हैं। बंगला गांव निवासी मोनिका भटनागर अपने पति के निधन के बाद परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए गोबर से दीया बनाने के कार्य से जुड़ी हैं। प्रकाश नगर निवासी सावित्री की नौकरी कोरोना संक्रमण काल में छूट गई थी। अब वह दीये बनाने के साथ लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक कर रही हैं।
वहीं, लाइनपार निवासी नीता शर्मा ने बताया कि उनके पड़ोसी गोबर के दीये लेने के लिए बहुत उत्सुक हैं। हरथला निवासी लक्ष्मी ने बताया कि वह स्नातक तक पढ़ाई करने के बाद दीये बनाने के कार्य से जुड़ी हैं। उनकी बहन रेखा बोलने-सुनने में अक्षम है, लेकिन गोबर की आकर्षक मूर्तियां बनाकर अपने हुनर से सबको चकित कर रही है।
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भगवती गो सेवा एवं पुनर्वास आश्रम के संचालक दीपक वार्ष्णेय ने बताया कि गोबर के दीयों के प्रति लोगों का सकारात्मक रुझान है। प्रतिदिन सौ से 150 फोन दीयों-मूर्तियों की बुकिंग के लिए आ रहे हैं। स्थिति यह है कि शनिवार को एक दिन में डेढ़ लाख दीयों की बुकिंग हुई है। अन्य दिनों में भी 30 हजार तक की बुकिंग हो रही है।
विदेश की नहीं ले रहे बुकिंग
दीयों की देश-विदेश में मांग है, लेकिन कम समय में इतनी आपूर्ति संभव नहीं होने की वजह से विदेश की बुकिंग नहीं ली जा रही है। केरल, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा आदि से ही ऑर्डर लिए जा रहे हैं। तीन डिजाइन में महिलाएं दीये बना रही हैं और एक दीये की कीमत पांच रुपये है। जबकि मूर्तियां 51 रुपये से 251 रुपये तक की हैं। मूर्तियां चार से नौ इंच तक ऊंचाई की हैं।
सात दिन में तेयार होता है गोबर का दीपक
दीये और मूर्ति बनाने में सिर्फ देसी गाय के गोबर का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। गोबर सुखाने के बाद मशीन में पीसा जाता है। इसके बाद छानकर उसे ग्वार, गम और पानी मिलाकर आटे की तरह गूंथा जाता है। इसके बाद सांचे से दीये और मूर्तियां बनाई जाती हैं। दीये की खासियत है कि बाती जलेगी, लेकिन दीया सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा दीया तेल भी नहीं सोखेगा, जिसकी वजह से तेल की बचत भी होगी। दावा है कि गोबर से निर्मित यह दीया 40 फीट की ऊंचाई से गिरने के बावजूद नहीं टूटेगा। गोबर का दीया सात दिन में तैयार होता है, जबकि मूर्तियों को तैयार करने में दस दिन का समय लगता है।
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