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सीसीटीवी कैमरे से होगी निगरानी

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अहरौरा। पहाड़ियों के गर्भ में बसे बेचूबीर धाम सहित संपूर्ण मेला क्षेत्र को दो जोन, चार सेक्टरों में विभक्त कर चार प्रभारी निरीक्षकों को मेला संपन्न कराने की कमान सौंपी गई है। भारी भरकम फोर्स की तैनाती के बाद चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल मेला क्षेत्र की निगरानी में जुटी हुई है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। भारी वाहनों के प्रवेश को ज्यादातर प्रतिबंधित रखा गया है। संपूर्ण मेला क्षेत्र धीरे धीरे पुलिस छावनी में तब्दील गयी।
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अहरौरा नगर से 14 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में स्थित पहाड़ के किनारे बसे बरही गांव में तीन दिवसीय बेचूबीर मेला का आयोजन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शुक्रवार से शुरू होगा। जो एकादशी की भोर में मनरी नामक वाद्य यंत्र बजने के बाद समाप्त होगा। बेचूबीर के मेले में पूर्वांचल सहित झारखंड, गुजरात, मध्यप्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, बिहार व राजस्थान के श्रद्धालु शिरकत करते हैं। प्रेत बाधा से मुक्ति और संतान प्राप्ति की चाह में लगने वाला मेला में बाबा की चोरी पर मत्था टेकने वाले परंपरागत श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। जिस को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बल को काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंह ने बताया कि मेला क्षेत्र को दो जोन चार सेक्टर में विभाजित कर चार थाना प्रभारी सहित कुल 30 उपनिरीक्षक , 25 हेड कांस्टेबल, 30 महिला आरक्षियों तथा 15 ट्रैफिक पुलिस सहित डेढ़ सौ जवानों की तैनाती की गई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के चलते दो प्लाटून पीएसी भी मेला क्षेत्र की सुरक्षा में तैनात रहेंगे। मेला में आए श्रद्धालुओं की सुरक्षा पुलिस की प्राथमिकता है। मेला के चप्पे चप्पे पर पुलिस मुस्तैद की गयी है जिससे मेला में शांति व्यवस्था कायम रह सके।
चौरी पर पहुंचे श्रद्धालुओं ने बेचूबीर बाबा का लगाया ध्यान
अहरौरा । कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी, शुक्रवार को मेला क्षेत्र में दुर्गम रास्तों से पैदल यात्रा कर अधिकांश श्रद्धालु चौरी के पास पहुंचने लगे है। श्रद्धा से ओतप्रोत कुछ भक्त बाबा की चौरी पर ध्यान मग्न भी हो गए है। कंकड़ीले व पथरीले दुर्गम रास्तों से श्रद्धालुओं का जत्था मेला स्थल पर मेला के पूर्व संध्या पर ही पहुंचने लगा है। मार्गो की मरम्मत तक नहीं कराई गई है। शुद्ध पेयजल और ठहरने का पर्याप्त प्रबंध भी श्रद्धालुओं के लिए गंभीर समस्या बनी हुई है। अष्टमी से लेकर एकादशी तक लगने वाले इस मेले में एकादशी की भोर में मनरी नामक वाद्य यंत्र के बजते ही पुजारी की विशेष पूजा के बाद भीड़ की कोलाहल ठहर जाती है और श्रद्धालुओं के आस्था और विश्वास के इस पर्व को अश्रुपूरित नजरों से विदा कर दिया जाता है।
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