हस्तिनापुर में प्राचीन पांडवेश्वर मंदिर
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ऐतिहासिक प्राचीन नगरी के पांडव वन ब्लॉक स्थित महाभारतकालीन प्राचीन पांडवेश्वर मंदिर क्षेत्र से ही नहीं देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है। शिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं एवं कांवड़ियों का आना शुरू हो गया है। शिवरात्रि के अवसर पर शुक्रवार को हजारों श्रद्धालुओं एवं कांवड़ियों द्वारा जल चढ़ाकर मनोकामनाएं पूर्ण की जाती हैं।
द्रौपदी करती थी पूजा
मंदिर के निकट पांडव टीले पर भगवान शिव की विशाल मूर्ति स्थित है। यहां पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर में लगी पांच पांडवों की मूर्ति महाभारतकालीन है। इसका अंदाजा उनकी कलाकृति से लगता है। यहां स्थित शिवलिंग प्राकृतिक है। यह शिवलिंग जलाभिषेक के चलते आधा रह गया है। पांडवेश्वर मंदिर के आसपास आरक्षित जंगल की हरियाली और ऊ़ंची पहाड़ियों की श्रृंखला प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम स्थल है। यहां प्रतिदिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। किवदंती है कि महाभारतकाल में पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने धर्मयुद्ध से पूर्व यहां शिवलिंग की स्थापना कर बाबा भोलेनाथ से युद्ध में विजयी होने की मन्नत मांगी थी। यही नहीं मंदिर के समीप गंगा की धारा बहती थी। जिसमें द्रौपदी प्रतिदिन इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती थीं। मंदिर परिसर के बीच में शिवलिंग स्थित है।
मंदिर परिसर स्थित प्राचीन विशाल वट वृक्ष है। इस वृक्ष के नीचे भी श्रद्धालु दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहीं पर प्राचीन शीतल जल का कुआं स्थित है। इसका जल श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं। इस जल के घर में छिड़कने से शांति मिलती है। महाभारतकालीन इस मंदिर का जीर्णोद्धार बहसूमा किला परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह ने 1798 में कराया था।
सौंदर्यीकरण कराया
एक दशक पूर्व पर्यटन विभाग द्वारा इस मंदिर का सौंदर्यीकरण कराया गया। यह प्राचीन महाभारतकालीन धरोहर भी उपेक्षित है। पर्यटन विभाग द्वारा मंदिर तक जाने वाले मार्ग को पक्का कराया था। पर्यटक और श्रद्धालु मंदिर में शिवलिंग के दर्शन करते हैं। मंदिर संचालक बालयोगी अमृतगिरि महाराज के निर्देशन में पांडवेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी एवं गऊशाला संस्थापक महंत रमनगिरि महाराज, आनंद गिरि महाराज, बालयोगी महाराज के आशीर्वाद से मेला लगता है। राजकुमार, डा. भंवर सिंह, किरनपाल सिंह, सहदेव तैयारी में जुटे हुए हैं।