आज से दस बीस साल पहले तक हाथ से महीन कारीगरी को महिलाओं के हुनर के तौर पर पहचाना जाता था। यहां तक कि विवाह के समय रंगीन धागों से की गई कढ़ाई वाली सूती-रेशमी बैड शीट्स, रुमाल, पर्दे, मेजपोश, टीवी-फ्रिज कवर आदि को बेटी के ससुराल उसकी योग्यता के प्रदर्शन के तौर पर भेजा जाता था। जिसकी क्रिएटीविटी जितनी शानदार होती उसे उतना ही योग्य समझा जाता था।
यहीं नहीं, लड़कियां अपनी दानी-नानी से नए डिजाइन सीखने के लिए घंटों उनके पास बैठी रहती थीं। बच्चों के कपड़ों जैसे कुर्ते-कमीज,फ्रॉक जैसे परिधानों पर भी फूल पत्तियों के डिजाइन हाथ से बनाए जाते थे। यहां तक बाजार से सामान लाने वाले सफेद थैलों पर भी कहीं न कहीं हाथ से कढ़ाई की गई होती थी।
हाथ की कढ़ाई जो हैं दुनिया भर में प्रसिद्घ
हालांकि वक्त के साथ साथ बाजारवाद पारंपरिक धरोहरों पर हावी होता गया और हैंडलूम्स पर मशीनों का कब्जा हो गया। लेकिन आज भी देश के कई राज्यों में वस्त्रों पर हाथ कढ़ाई करने का प्रचलन है जो देश-विदेशों तक प्रसिद्घ है। इनमें बिहार की कांथा व सुजनी कढ़ाई, गुजरात की अहीर व जाट कढ़ाई, हिमाचल प्रदेश की चंबा रुमाल कढ़ाई, पंजाब की फुलकारी व बाग कढ़ाई, यूपी की चिकनकारी कढ़ाई, जम्मू कश्मीर की पारंपरिक सोजनी, दुरूख व कशीदाकारी हाथ की कढ़ाई के ऐसे नमूने हैं जिनकी विश्व भर में भारी मांग है।
जी हां, यह कहना गलत नहीं होगा कि देश के ग्रामीण अंचलीय क्षेत्रों में बसने वाली इस विरासत को मॉर्डन डिजाइनर्स ने फिर से सांस दी है। दरअसल, यहां गांव-देहात के क्षेत्रों में आने वाले देसी-विदेशी डिजाइनर्स और पर्यटकों ने यहां से इस हुनर को हवा दी। वहां से देश के मशहूर डिजाइनर्स सुई धागे से गई कारीगरी और कढ़ाई से सजे कलेक्शन लेकर आ रहे हैं।
वैवाहिक परिधानों पर भी रंगीन धागों का राज
इंडियन ब्राइडल परिधानों में भी हैंड वोवेन थ्रेडवर्क और जरी का काम फिर से देखने को मिल रहा है। इसके लिए डिजाइनर उन स्थानीय कारीगरों को अप्रोच कर रहे हैं जहां धागे व जरी की कढ़ाई का काम बरसों से होता आया है। यही कारण है कि डिजाइनर सब्यासाची ने अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की शादी के परिधानों को डिजाइन करने के दौरान बनारस के ट्रेडिशनल कारीगरों को अप्रोच किया।
डिजाइनर मनीष मल्होत्रा, अनामिका खन्ना, तरुण ताहिलानी जैसे कई बड़े डिजाइनर्स भी ट्रेडिशनल साड़ियों के कलेक्शन को हाथ की कढ़ाई के मॉर्डन अंदाज के साथ पेश कर चुके हैं। पुरुषों के वैवाहिक परिधानों में भी धागे की कढ़ाई की मांग बढ़ी है।
शादी के लिए टू पीस और थ्री पीस सूट व वेस्ट कोट, नेहरू जैकेट्स में भी रंगीन धागों की महीन कारीगरी युवाओं को पसंद आ रही है। इसमें पैचवर्क की काफी मांग में है। डिजाइनर पुरुषों के लिए ऑलिव ग्रीन, ब्लैक पीले और पर्पल जैसे रंगों से उड़ते हुए हंस,मक्खी,क्राउन आदि के डिजाइन मार्केट में ला रहे हैं।
विश्व भर में डेनिम से बने परिधानों की सबसे ज्यादा डिमांड है। अब डिजाइनर्स जीन्स, शर्ट और जैकेट्स को रंगीन धागों से सजा रहे हैं। विदेशों में जैकेट्स पर हैंड वर्क वाले परिधानों की विशेष मांग है। मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित एक बुटीक की ऑनर निधि जैन के अनुसार इन दिनों फिर थ्रेडवर्क और हैंडवर्क की डिमांड काफी है। चिकनकारी के लिए हम लखनऊ और उसके आस पास के इलाकों से कारीगरों चिकनकारी कराई जाती है। इसके अलावा जरदोजी, कटदाना व पोत का काम भी काफी डिमांड में हैं। साड़ियों व इंडोवेस्टर्न ड्रेसेज पर इसकी काफी डिमांड है।
महिलाओं के पर्स,क्लच,लेडीज बैल्ट और हैंडबैग्स पर भी थ्रेडवर्क फैशन में है। रेशमी और जरी के धागे वाली कढ़ाई से सजे पर्स व क्लच यंग गर्ल्स की फेवरेट लिस्ट में शामिल हैं। इसके अलावा मैन्स पर्स, पॉकेट स्क्वायर,कमीज के कॉलर पर भी थ्रेडवर्क डिजाइन देखे जा सकते हैं।
जूतों पर भी सुई धागे ने बनाई पकड़
पंजाबी व राजस्थानी जूतियों पर हाथ की कारीगरी काफी चलन में है लेकिन अब एथनिक वियर्स के साथ साथ पुरुषों के जूतों और महिलाओं की हील्स पर भी सुई धागे ने पकड़ बनाना शुरू किया है। यह अलग बात है कि अभी इसकी डिमांड दूसरे देशों और मेट्रो सिटीज में है लेकिन यह कला इस तरह आगे बढ़ रही है यह भी कम नहीं। देश विदेश की मशहूर शूज ब्रांड मॉडर्न तरीके से की गई हाथ की कढ़ाई से सुसज्जित जूते और हील्स के कलेक्शन पेश कर रहे हैं। इनमें जैसे विदेशी ब्रांड,मार्क जैकब्स, कैल्विन क्लीन, डोलसे एंड गबाना,जैसे डिजाइनर ब्रांड भी शामिल हैं।
क्रोशिया की कारीगरी भी अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। भारत में यह कला दक्षिण भारत में अठारहवीं शताब्दी में शरू हुई। यहां मुगल महिलाओं ने इसे अपनाया और फिर हैदराबाद आंध्रप्रदेश और यूपी के मिर्जापुर और दिल्ली में फैला। उत्तर भारत में आज से दस बीस साल पहले तक लड़कियां व महिलाएं क्रोशिया से बुनती थीं। बताया जाता है कि दक्षिण भारत से बड़े पैमाने पर ग्रामीण महिलाएं इसे बुनकर विदेश भेजती थीं। जो वहां खूब बिकता था। लेकिन बाद में इसका प्रचलन कम हो गया।
विदेशों में महिलाएं ही नहीं पुरुष भी चलाते हैं क्रोशिया
सूती धागे के साथ छह इंच लंबी हुकदार सलाई से की जाने वाली कारीगरी का यह हुनर भी खत्म होने लगा है। रंग-बिरंगे सूती धागे से लेस या जाली की बुनावट के साथ तैयार किए गए इस काम की विदेशों में बहुत ज्यादा मांग है। अरब देशों के साथ साथ चीन और जापान में न सिर्फ महिलाएं बल्कि पुरुषों को भी क्रोशिया चलाते देखा जा सकता है। इस काम में महीन धागे को सलाई पर लपेटते हुए हुक के सहारे झालर,मेजपोश,चौकार पर्दे,आदि बनाए जाते हैं। खास बात यह है कि यह बेहद दिमाग वाला काम है क्योंकि इसमें ज्यामितिक आकृति से बुनाई की जाती है। जाली को घुना जाता है ताकि बनाई गए आकार में कलाकृतियां सपष्ट नजर आएं।
कम लेकिन यहां आज नजर आता है क्रोशिया का काम
क्रोशिए का काम बहुत कठिन है साथ ही इसमें काफी समय भी लग जाता है। यही कारण है कि आज बदलते फैशन के दौर में इसका चलन बेहद कम हो गया है। लेकिन आज भी कई जगह इस कारीगरी को जिंदा रखा गया है। राजस्थान और गुजरात में घर की खिड़कियों व मंदिरों को सजाने के लिए क्रोशिया डिजाइन प्रयोग किए जाते हैं। इसी तरह मुस्लिम परिवारों में नमाज के वक्त पहनने वाली टोपियों को भी क्रोशिया से बुना जाता है।
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