रोजा इफ्तार का रहता है पूरा इंतजाम
रमजान में रोजेदारों की सेवा करना बड़े सवाब का काम है। पहले रोजेदारों को सहरी के लिए जगाने के लिए टोलियां मोहल्लों में घूमा करती थीं। इन टोलियों में युवाओं के साथ बच्चे भी होते थे, जो घर-घर जाकर दरवाजा खटखटाते थे। अब समय बदल गया है। ऐसी टोलियां दिखाई नहीं देतीं। इसका कारण लोगों में मेलजोल खत्म होना भी है।
घंटाघर के मोहल्ला कोटला निवासी बुजुर्ग हफीजुद्दीन बताते हैं कि पहले आदमी इशा के नमाज के बाद बेफिक्र होकर सोता था। ये टोलियां सहरी से एक घंटा पहले ही जगा देती थीं। गुजरी बाजार के हाजी शम्स कादरी ने बताया कि रोजेदारों को सहरी के लिए जगाना भी सवाब का काम है। कभी इन टोलियों में शामिल रहे खैरनगर के जमील अहमद बताते हैं कि संसाधनों के बढ़ते उपयोग के कारण रोजेदारों को जगाने वाली टोलियों की अहमियत कम हो गई है।
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