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खास रिपोर्ट: ऐसे भड़की थी 1857 की क्रांति की ज्वाला, पढ़िए 85 सिपाहियों के हौसले की पूरी कहानी

Sat, 07 May 2022 01:34 PM IST
कपिल kapil अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ

सार

1857 की क्रांति की ज्वाला ऐसे ही नहीं भड़की थी। इसके पीछे की क्या कहानी है। आइए आज आपको पूरे इतिहास के बारे बताते हैं।
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सात मई 1857 को मेरठ से क्रांति की मशाल ने चिंगारी पकड़ी। सिपाहियों को काली पल्टन मंदिर के कुएं का पानी पिलाने से इसलिए इनकार कर दिया गया कि वह गाय और सुअर की चर्बी से बने कारतूसों को मुंह से लगा रहे थे। इसके बाद ही 85 सिपाहियों के दिल में ज्वाला उठी और कारतूस का उपयोग करने से इनकार कर दिया।

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इसमें सबसे आगे नायक शेख पीर अली रहे। उन्होंने सुबह की परेड में कर्नल कमाईकल स्मिथ के सामने कारतूसों को छूने से इनकार कर दिया और कहा कि बहुत बदनामी होगी। उनके पीछे खड़े नायक कुदरत अली और हवलदार हीरा सिंह ने भी यही बात दोहराई। केवल 90 घुड़सवार में से पांच घुड़सवार सैनिकों ने हाथ से पकड़कर रायफल में भरने की विधि को अपनाया। 

गंगाजल और कुरान की कसम खाकर छोड़े कारतूस
23 अप्रैल की शाम को रेजिमेंट के सिपाहियों ने जिसमें आधे हिंदू और मुस्लिम थे। उन्होंने गंगाजल और कुरान की कसम खाई कि वे अगले दिन परेड में इन कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर देंगे। सेना के कानून के अनुसार वरिष्ठ अधिकारी के आदेश को न मानना दंडनीय अपराध माना गया। इस घटना की जानकारी जनरल ऑफिसर कमांडिंग जनरल ह्यूइट को दी गई। इसके बाद कोर्ट ऑफ इंक्वायरी बैठाई गई। छह, सात और आठ मई को 85 क्रांतिकारी सिपाहियों के कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया चली। 
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इसके बाद सभी को दस साल के कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि, जनरल ह्यूइट ने पांच सिपाहियों की सजा उनकी छोटी उम्र को देखते हुए पांच साल कम कर दी।

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कैंटोनमेंट जनरल अस्पताल में लगा दी आग
कारतूसों का उपयोग बंद करने के एलान के बाद आठ मई तक आगजनी की कई घटनाएं हुईं। रिहायशी मकानों में आग लग जाती थीं लेकिन अंग्रेज अधिकारियों को ऐसा प्रतीत होता था कि मौसम की गर्मी की वजह से आग लगी है। आग क्रांतिकारियों द्वारा लगाई जाती थी। क्रांतिकारी रात के अंधेरे में इमारत की फूस की छतों को आग लगा देते थे। इसमें एक प्रमुख इमारत बैरक मास्टर्स गोडाउन थी, जिसे छह मई को आग के हवाले कर दिया गया। यह स्थान आज कैंटोनमेंट जनरल अस्पताल है। 

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ये थे 85 सिपाही, जिनका हुआ कोर्ट मार्शल
हवलदार मातादानी, शेख पीर अली, आमिर कुदरत अली, शेख हुसेनुद्दीन, शेख नूर मौहम्मद, शीतल सिंह, जहांगीर खान, मीर मौसिम अली, अली नूर खान, मीर हुसन बख्श, मथुरा सिंह, नारायण सिंह, लाल सिंह, श्योदान सिंह, शेख हुसैन बख्श, साहिबदाद खान, बिशन सिंह, बलदेव सिंह, शेख नुन्दु, नवाब खान, शेख रमजान अली, अली मोहम्मद खान, मक्खन सिंह, दुर्गा सिंह प्रथम, नसरुला बेग, मेहराव खान, दुर्गा सिंह द्वितीय, नवी बख्श खान, जुरखान सिंह प्रथम, नुदजू खान, जुरखान सिंह द्वितीय, अब्दुल्ला खान, ईसैन खान प्रथम, जबरदस्त खान, मुर्तजा खान, बरजूर सिंह, अजीमुल्ला खान प्रथम, अजीमुल्ला खान द्वितीय, काला खान, शेख सादुल्ला, सालार बख्श खान, शेख रउत अली, द्वारका सिंह, कालका सिंह, रघुवीर सिंह, बलदेव सिंह, दर्शन सिंह, इमदाद हुसैन, पीर खान प्रथम, मोती सिंह, शेख फजुल इमाम, हीरा सिंह, सेवा सिंह, मुराद शेर खान, शेख आराम अली, काशी सिंह, अशरफ अली खान, कादर दाद खान, शेख रुस्तम, भगवान सिंह, मीर इम्दाद अली, शिव वक्श सिंह, लक्ष्मण सिंह, शेख इमाम वक्श, उस्मान खान, दरयाव सिंह, मकसूद अली खान, शेख गयास वख्श, शेख उम्मेद अली, अब्दुल वहाब खान, राम सहाय सिंह, पनाह अली, लक्ष्मण दुबे, राम शरण सिंह, शेख ख्वाजा अली, शिव सिंह, शीतल सिंह, मोहन सिंह, विलायत अली खान, शेख मौहम्मद रब्बाज, इंदर सिंह, फतह खान, मैकू सिंह, शेख कासम अली, राम चरन सिंह। 
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