लाचारी... आंखें नम और लब खामोश। अपना दर्द कैसे बयां करें अल्फाज भी नहीं मिल रहे हैं। मेरठ में गुरुवचन और यशपाल के परिवार वालों का कुछ ऐसा ही हाल है। गुरुवचन के परिवार को उनके आखिरी सफर तक में शामिल होने का मौका नहीं मिला, तो यशपाल के पुत्र को 20 घंटे के भीतर दो बार अंतिम संस्कार करना पड़ा।
अपनों का जाना कभी न भूलने वाला गम है लेकिन अगर अपनों का अंतिम संस्कार भी न कर सकें तो यह गम और बढ़ जाता है। गुरुवचन के बेटे नरेश का कहना है सारी उम्र उन्हें यह दुख रहेगा कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार भी नहीं कर सके। आखिरी बार उनका चेहरा भी देखना चाहते थे लेकिन कोविड प्रोटोकल के कारण ऐसा नहीं कर पाए। एक तो पिता को खोने का गम और फिर उनकी चिता को अग्नि भी ना दे पाना। यह बेहद कष्टदायक है, इसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है। सूरजकुंड श्मशान घाट पर जाकर उन्होंने अंतिम संस्कार की बाकी प्रक्रिया रविवार को पूरी कीं। चार दिन बाद फूल लेने के लिए फिर आएंगे। उन्होंने कहा, यह सब मेडिकल कॉलेज की लापरवाही के कारण हुआ है। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
‘जिस शव का अंतिम संस्कार किया, वह उसके पिता का नहीं था’
यशपाल के बेटे वरुण का कहना है कि उसने पहले शनिवार रात 8:00 बजे पिता समझकर गुरुवचन का अंतिम संस्कार किया और 20 घंटे बाद रविवार शाम 4:00 बजे फिर अपने पिता का अंतिम संस्कार किया। श्मशान घाट दो बार जाना और यह पता चलना कि जिसका पहले अंतिम संस्कार किया वह उसके पिता थे ही नहीं और फिर दोबारा से अपने पिता का अंतिम संस्कार करना, वरुण के लिए बेहद पीड़ादायक है।
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बताया कि जैसे ही मोदीनगर से उसके मोबाइल पर फोन आया और उसे पता चला कि उसने जिस शव का अंतिम संस्कार किया था, वह उसके पिता का नहीं था। यह सुनते ही उसके तो पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। फिर मेडिकल कॉलेज की एंबुलेंस में अपने पिता का शव लेकर सूरजकुंड श्मशान घाट पहुंचा।
मजहब अलग होते तो...
शवों की अदला-बदली में हुई लापरवाही में अगर शव अलग-अलग मजहब को मानने वालों के होते तो उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी बदल गई होती। दिल्ली में इस तरह की घटना हो चुकी है।
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