2009 के लोकसभा चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय था। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और प्रदेश में बसपा की। सपा अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही थी। भाजपा ने राजेंद्र अग्रवाल को अपना प्रत्याशी बनाया था, जबकि बसपा ने मलूक नागर और सपा ने शाहिद मंजूर को उतारा था। सबसे कड़ा मुकाबला मेरठ दक्षिण में था।
हापुड़ में भाजपा को 39673 वोट, बसपा को 37970 वोट और सपा को 31063 वोट मिले थे। किठौर ऐसी सीट थी जहां भाजपा तीसरे नंबर पर रही थी। बसपा को यहां सबसे अधिक 50548 वोट और सपा को 47569 वोट मिले थे। राजेंद्र अग्रवाल को 35913 लोगों ने वोट किया था। सबसे बड़ा अंतर पैदा किया मेरठ कैंट सीट ने। यहां भाजपा को बड़ी बढ़त मिली। बढ़त करीब 28 हजार वोटों की थी।
2009 में हुए परिसीमन के बाद मेरठ सीट का गणित ही बदल गया। पहले इसमें मेरठ जिले की ही पांच विधानसभा सीटें थीं। इसमें किठौर, कैंट और मेरठ शहर के अलावा हस्तिनापुर और खरखौदा सीटें मेरठ लोकसभा का हिस्सा थीं।
परिसीमन में हस्तिनापुर को बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में शामिल कर दिया गया और खरखौदा की जगह मेरठ दक्षिण सीट का नाम दे दिया गया। हापुड़ शहर की सीट को मेरठ से जोड़ दिया गया। सीट का नाम भी मेरठ-हापुड़ लोकसभा क्षेत्र कर दिया गया।
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