पिता पीएल तलवार बताते हैं कि सियाचिन जाने से पहले वे मार्च में मेरठ घर आए। छुट्टी खत्म होने से कुछ दिन पहले माता-पिता, भाई व बहन ने उनसे शादी करने की बात कही। इस पर उन्होंने कहा कि मां मेरा समर्पण तो देश के साथ जुड़ चुका है। अभी तो उसकी हिफाजत के लिए वचनबद्ध हूं। पता नहीं क्या हो। मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करूंगा। इसके बाद वे कारगिल चले गए।
...वो आखिरी चिट्ठी
12 जून 1999 को उन्होंने आखिरी चिट्ठी लिखी। कैप्टन पीएल तलवार बताते हैं कि मनोज क्रिकेट का बहुत शौकीन था। उसने लिखा कि भारत की पाकिस्तान पर क्रिकेट में जीत का जश्न हमने दुश्मनों पर गोले बरसाकर मनाया है। चिंता मत करना। मैं युद्ध में अपना फर्ज निभा रहा हूं। ये चिट्ठी पोस्ट करने के बाद मेजर मनोज तलवार कारगिल में टुरटक सेंटर की शून्य से 60 डिग्री नीचे तापमान की 19 हजार फीट ऊंची खड़ी चोटी पर घुसपैठियों को भगाने के लिए अपनी टुकड़ी लेकर बढ़ चले। 13 जून 1999 की शाम दुश्मनों को मारकर ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। लेकिन इसी बीच दुश्मनों की तोप के गोले से वे शहीद हो गए।
कैप्टन पीएल तलवार बताते हैं कि 14 जून 1999 की दोपहर जैसे ही दिल्ली दूरदर्शन से समाचार प्रसारित हुआ तो वह बेचैन हो उठे। बेटे की शहादत का पता चला तो आवाज नहीं निकली। वह बताते हैं कि वह पल आज भी आंखों के सामने है। 16 जून की सुबह मनोज तलवार का पार्थिव शरीर मेरठ लाया गया। उसकी लिखी चिट्ठी भी उसी दिन पहुंची। मां ऊषा तलवार का बुरा हाल हो गया। 12 दिसंबर 2016 को उनको देहांत हो गया। पीएल तलवार बताते हैं कि अंतिम समय तक वो मनोज को याद करती रहीं।
प्रशासन ने की अनदेखी
पीएल तलवार बताते हैं कि प्रशासन ने कमिश्नर आवास चौराहे के रखरखाव के समय मेजर मनोज तलवार की प्रतिमा को बीच स्थान से हटाकर फुटपाथ पर लगा दिया। यह एक शहीद की अनदेखी रही। पत्थर पर शहादत की तिथि भी गलत लिखवा रखी है। उन्होंने अफसरों से गुहार भी लगाई। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। वे कहते हैं कि शहीदों की इस तरह से उपेक्षा करेंगे तो कौन देश पर कुर्बान होगा। शहीद मनोज तलवार की दो बहनों की शादी हो चुकी है। छोटे भाई नवनीत तलवार पेट्रोल पंप का काम देखते हैं।
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