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काम की बात: बढ़ता शोर और ईयरफोन सुनने की क्षमता को कर सकते हैं प्रभावित, जानें कितनी आवाज में संगीत सुनना सही

Wed, 19 Jun 2024 04:20 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

हाल ही में बाॅलीवुड की मशहूर सिंगर अलका याज्ञनिक की कान में हुए संक्रमण के कारण सुनने की क्षमता प्रभावित हुई है। बढ़ते शोर और ईयरफोन लगाकर तेज आवाज में संगीत सुनने से भी सुनने की शक्ति पर असर पड़ता है। 
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तेज आवाज में म्यूजिक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बढ़ता शोर और ईयर फोन से सुनने की क्षमता कम होती जा रही है। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में हर महीने ईएनटी (नाक-कान-गला) के सात हजार मरीज आते हैं। इनमें कान की समस्या वाले सबसे अधिक होते हैं। हाल ही में गायिका अलका याज्ञनिक ने एक पोस्ट में बताया कि एक संक्रमण के कारण उनकी सुनने की क्षमता प्रभावित हुई है। अलका की ही तरह कई लोगों को इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसकी एक वजह शोर और हेडफोन या ईयरफोन लगाकर तेज आवाज में संगीत सुनना भी है।

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अगर सुनने की क्षमता सही रखनी है तो ध्वनि प्रदूषण से बचें। एक सीमा से अधिक शोरगुल होने पर लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। तेज धुन से बजने वाले डैक, वाहनों का शोर, अधिक समय तक टीवी देखने और ध्वनि विस्तारित यंत्रों के ध्वनि प्रदूषण से हृदय रोग और सुने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है।

चिकित्सकों लोगों को ध्वनि प्रदूषण से बचने की हिदायत देते हैं। इस संबंध में लोगों को जागरूक करने के लिए हर वर्ष अप्रैल के आखिरी बुधवार को अंतरराष्ट्रीय शोर जागरूकता दिवस भी मनाया जाता है।

चिकित्सकों का कहना है कि इस बात को समझना होगा कि शहरी क्षेत्र में वाहनों के शोर के अलावा अधिक समय तक घरों में टीवी से चिपके रहने, ईयर फोन लगाकर घंटों गाने या फोन पर बात करने से बहरापन पनपने लगता है। रोड ट्रैफिक के कारण तेज हॉर्न बजने से स्वास्थ्य को नुकसान होता है। वैवाहिक कार्यक्रम के अलावा बर्थ डे आदि अन्य कार्यक्रमों में डीजे पर तेज ध्वनि से गानों को बजाने से कानों के पर्दे प्रभावित होते हैं। 

जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में हर माह करीब सात हजार मरीज आते हैं। इनमें कानों की समस्या के सबसे ज्यादा मरीज होते हैं।

यह हैं सुनने की क्षमता के मानक
-15 से 20 डेसीबेल तक की आवाज से कान को कोई नुकसान नहीं होता है। यदि आप इतनी आवाज में संगीत सुनते हैं तो सुनने की क्षमता को नुकसान होने की संभावना न के बराबर रहती है।
-60 से 65 डेसीबेल के बाद कान को आवाज चुभने लगती है। इससे कान में खुजली महसूस हो सकती है।
-85 से 120 डेसीबेल आवाज पटाखे की होती है, यह आवाज भी कान के पर्दे को प्रभावित कर सकती है।
-85 से 115 डेसीबेल आवाज हैडफोन की होती है। यदि फुल वाॅल्यूम पर आप लंबे समय तक संगीत सुनते हैं तो यह हानिकारक हो सकता है।
-115 डेसीबेल की आवाज से कान का पर्दा फट सकता है। यह बच्चे से लेकर बड़ों तक के लिए हानिकारक है।
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साइन बोर्ड लगाने चाहिए
स्कूलों और अस्पतालों जैसे क्षेत्रों के आसपास यातायात प्रवाह को कम से कम किया जाना चाहिए। साइलेंस जोन वाले साइन बोर्ड लगाए जाने चाहिए। -डॉ. वीपी सिंह, ईएनटी, मेडिकल कॉलेज

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक शोरगुल
शहरी क्षेत्र में वाहनों के शोरगुल के अलावा अन्य माध्यमों से फैल रहा ध्वनि प्रदूषण सेहत के लिए हानिकारक है। 50 डेसिबल ध्वनि स्तर तक सेहत खराब नहीं होती, लेकिन यदि यही ध्वनि स्तर 80 डेसिबल हो जाता है तो  वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। -डॉ. अखिलेश मोहन, मुख्य चिकित्सा अधिकारी

घटने लगी सुनने की क्षमता
लगातार शोर-शराबे के बीच रहने से कान को नुकसान पहुंचता है। इससे सुनने की क्षमता घटने लगती है। लगातार शोर से संवेदी तंत्रिका को नुकसान हो सकता है। -डॉ. बीपी कौशिक, ईएनटी, जिला अस्पताल
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