साहित्य से समाज सुधार की अपील
चौ. मुल्कीराम ने साहित्य को समाजसुधार का जरिया बनाया। अपनी कविताओं से जातिभेद मिटाने का संदेश दिया। भक्तिरस में पगी रचनाएं रचीं और संतकवि कहलाए। विचारशील व्यक्तित्व से धनी मुल्कीराम ने जातिभेद पर खूब लिखा। वो लिखते हैं निज सर पर लादे पापा भार, मन डोल रहा है बार बार, प्रभु दो मुझको सदविचार, जीवन की नैया करुं पार।
पुस्तक की शक्ल में आए हृदयोदगार
चौ. मुल्कीराम की कविताओं को महाकवि डॉ. ताराचंद पाल बेकल ने हृदयोदगार पुस्तक में समाहित कर प्रकाशित किया। मेरठ के आयुक्त रहे आरडी सोनकर मुल्कीराम के दामाद थे। चौधरी यादराम से बहुत अच्छी मित्रता रही। ताराचंद पाल, पद्मसिंह पद्म, मुल्कीराम विचार मंच के तत्वावधान में साहित्यिक आयोजन होते और बच्चों को हिंदी से जोड़कर सम्मानित किया जाता।
कई मंच किए साझा
चौ. मुल्कीराम के साथ लंबा वक्त गुजरा। इनका परिवार बाहर रहता है। हमने कई मंच साथ साझा किए। कई यात्राओं के साथी बने। हिंदी को लेकर उनमे प्रेम और उबाल दोनों थे। वो कहते थे हिंद में रहकर हिंदी की इज्जत न करेंगे तो क्या करेंगे। हिंदी को नहीं छोड़ सकता।
- कवि पद्म सिंह पद्म, शास्त्रीनगर
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