वहीं, ओज के प्रसिद्ध कवि हरिओम पंवार को जब ये खबर दी गई तो हक्के-बक्के रह गए। वो अपने अजीज दोस्त की याद में खो गए। फिर कुछ संभले और बोले कि हर शख्स इस दुनिया से जाने के लिए आता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीते भी अपने अलग अंदाज और पहचान से हैं और गुजरने के बाद भी ऐसा नकश छोड़ जाते हैं कि सदियों तक याद किए जाते हैं। मुनव्वर राणा ऐसी ही शख्सियत थे।
नामचीन शायर नवाज देवबंदी का कहना है कि मुनव्वर राणा की शायरी देश-दुनिया का दर्द समेटे हुए समाजिक सरोकारों को साकार करती नजर आती है। मां और बेटियों पर उन्होंने भावनात्मक शायरी की। मुनव्वर के शेर जज्बाती लफ्जों की बेहतरीन नक्काशी है।
मजाहिया शायर पापुलर मेरठी का कहना है कि साहित्य के क्षेत्र में मुनव्वर साहब की भरपाई कर पाना नामुमकिन है। वो इंसान भी लाजवाब थे और शायर भी शानदार थे। ऐसे शायर सदियों में पैदा होते हैं। दुनियाभर के अदबी सफर में हम दोनों साथ रहे। बाहर से बेहद संजीदा और अंदर से नाजुक मिजाज थे मुनव्वर साहब।
शायरी के मयार को हमेशा कायम रखा
‘किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई।’ रिश्तों के ताने बाने में मुनव्वर राणा नसीहत का जाल भी अनूठे अंदाज में बुनते थे। उन्होंने ताउम्र शायरी के मयार को गिरने नहीं दिया। सादगी के लबादे में लिपटी मुनव्वर की गजल पाकीजगी का वो मुजस्समा है जो अदब की तमाम उठापटक के बीच ताजमहल की खूबसूरती और लालकिले की मजबूती लिए बड़े शान से खड़ी नजर आती है। वह समाजी और सियासी मसाइल को बड़ी संजीदगी से इस तरह झकझोरते हैं कि दिल और दिमाग पर नशा तारी हो जाता है। मुनव्वर जब शायरी पढ़ते थे तो लगता था कि मानो तितलियों से खेल रहे हों।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश से था जज्बाती रिश्ता
मुनव्वर राणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शायरों, कवियों और शायरी के कद्रदानों के बीच काफी मकबूल व लोकप्रिय थे। मेरठ और आसपास के जिलों में आयोजित महफिलों में वो अक्सर आते रहते थे। यहां के अनगिनत लोग उनसे अपनत्व का भाव रखते थे। दरअसल, मुनव्वर साहब हर उम्र और हर तबके के शख्स से दोस्ताना रिश्ता कायम कर लेते थे। मेरठ में कवि हरिओम पंवार, पापुलर मेरठी और अजहर इकबाल, मुजफ्फरनगर में रियाज सागर, आलिम व शायर खालिद जाहिद, बिजनौर में अतहर शकील और शकील जमाली, सहारनपुर में शब्बीर शाद व नवाज देवबंदी से उनके करीबी रिश्ते थे। खालिद जाहिद बताते हैं कि मुनव्वर साहब खाने के बेहद शौकीन थे।
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