कैसे 2009 के पैटर्न पर नजर आया चुनाव
पहले चरण में जिन आठ सीटों पर चुनाव हुआ है उसमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर और पीलीभीत की सीट शामिल रहीं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इन सीटों पर मतदान का औसत प्रतिशत 61 रहा। जबकि 2009 के चुनाव में इन्हीं सीटों औसत मतदान 56.77 प्रतिशत हुआ था।
2009 में कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन था। सपा, बसपा और भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़े थे। उस समय बसपा ने तीन, सपा ने दो, रालोद, कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। खास बात यह थी कि पीलीभीत छोड़ कर किसी भी सीट पर हार जीत का अंतर एक लाख से कम था।
वहीं, पीलीभीत में वरुण गांधी ने दो लाख 81 हजार से अधिक मतों से जीत हासिल की थी। 2014 और 2019 में मतदाताओं में जबर्दस्त उत्साह दिखा था। इन दोनों चुनावों में औसत मतदान 66 प्रतिशत से अधिक रहा था।
आठ प्रतिशत कम हुआ मतदान मुजफ्फरनगर में 2019 के मुकाबले
2019 के मुकाबले इस बार जिन सीटों पर शुक्रवार को चुनाव संपन्न हुआ उसमें तीन से नौ प्रतिशत वोटिंग कम हुई। मसलन नगीना में 2019 में 63 प्रतिशत मतदान हुआ था, इस बार 59.54 प्रतिशत रहा। पीलीभीत में करीब चार प्रतिशत कम मतदान हुआ। पिछले चुनाव में 67 प्रतिशत और इस चुनाव में 63.70 प्रतिशत रहा। मुजफ्फरनगर में पिछले चुनाव के मुकाबले आठ प्रतिशत कम लोगों ने मतदान किया। वहीं, रामपुर में नौ प्रतिशत कम मतदान हुआ। मुरादाबाद में यह अंतर पांच प्रतिशत, सहारनपुर में दो प्रतिशत देखने को मिला। बिजनौर में इस बार 58.21 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि 2019 में 66.22 रहा था।
- एक दूसरे से ज्यादा सीट लाने की होड़
एक तरफ भाजपा जहां 400 पार के नारे के साथ मैदान में है और यूपी की सभी 80 सीटों को जीतने का दावा कर रही है। वहीं, बसपा और सपा के बीच एक-दूसरे से अधिक सीट लाने की होड़ है। दरअसल, 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही थीं। रालोद भी उनके साथ थी। नतीजा आया तो सपा को पांच और बसपा को 10 सीटें मिलीं। रालोद की झोली खाली रही थी। इस बार दोनों ही दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में दोनों की कोशिश एक दूसरे से अधिक सीट हासिल करने की है। शुक्रवार को जिन आठ सीटों पर चुनाव हुआ है उनमें तीन सीटों सहारनपुर, बिजनौर और नगीना पर बसपा, तीन सीटों कैराना, मुजफ्फरनगर और पीलीभीत पर भाजपा और दो सीटों मुरादाबाद और रामपुर पर समाजवादी पार्टी का कब्जा था। वहीं, 2014 में इन सभी सीटों पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया था। देखना दिलचस्प होगा कि 2024 के चुनाव में कौन सी पार्टी अपनी सीट बचा पाती है और कौन सी पार्टी अपनी सीट गंवाती है।
- अपने-अपने तरीके से लगा रहे गणित
2014 और 2019 के मुकाबले कम हुए मतदान ने राजनैतिक दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस आंकड़े को राजनैतिक दल अपने-अपने पक्ष में देख सकते हैं। चुनाव के समय देश में कांग्रेस की सरकार थी और 2009 के चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई। ऐसे में भाजपा के हिमायती कह सकते हैं क्योंकि 2009 में तत्कालीन सरकार की वापसी हुई थी, इसबार भी मतदान का पैटर्न वही रहा है तो भाजपा सरकार वापस आने जा रही है। वहीं विपक्ष इस बात पर खुश हो सकता है कि कम मतदान में उसके प्रत्याशियों की जीत होती रही है। ऐसे में इस चुनाव में हुआ कम मतदान उसके पक्ष में जा सकता है।
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क्षत्रिय समाज के विरोध का कई जगह दिखा असर
पश्चिम यूपी में सबसे पहले राजपूत समाज की संघर्ष समिति की तरफ से महाकुंभ नानौता में सात अप्रैल को हुआ। वहां पर बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। उसमें भाजपा पर अनदेखी का आरोप लगाते हुए नाराजगी जताई गई थी।
पंचायत में आह्वान भी किया गया था कि जो भाजपा को हराएगा उसे वोट दिया जाएगा, लेकिन मतदान के दौरान अलग-अलग ट्रेंड दिखाई दिया। कई जगहों पर राजपूत समाज का वोट प्रतिशत कम रहा, तो कई जगहों पर भाजपा के साथ-साथ दूसरे दलों को भी वोट मिलते दिखाई दिए। दिनभर में नानौता के तीन मतदान केंद्रों पर मात्र 51.81 प्रतिशत मतदान हुआ, जो अन्य स्थानों के मुकाबले काफी कम है।
मुजफ्फरनगर में लगने वाली सरधाना विधानसभा क्षेत्र के क्षत्रिय बाहुल्य गांवों कम मतदान हुआ। जहां मतदान हुआ वहां सपा और भाजपा के बीच बराबर का बंटवारा हुआ। जबकि मुजफ्फरनगर के गांवों में बंटवारा तो जरूर हुआ लेकिन ज्यादातर वोट भाजपा की झोली में गए।
कैराना में भी राजपूत बाहुल्य गांवों में विरोध का असर साफ देखने को मिला यहां भी अच्छी खासी तादाद में राजपूत वोटरों ने उदासीनता अख्तियार की। बाकी वोटर सपा और भाजपा के बीच बंटते नजर आए।