ढाई साल में न मशीन आई न स्टाफ
जिला अस्पताल में करीब 25 लाख रुपये खर्च कर एक बिल्डिंग पर एमआरआई यूनिट की तख्ती टांग दी गई। करीब ढाई साल बाद भी यहां न तो एमआरआई करने वाली की मशीन है और स्टाफ। मरीजों को मेगनेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) के लिए या तो मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है या फिर निजी लैब में महंगी जांच कराने को मजबूर हैं। निजी लैब में एक एमआरआई के लिए तीन से 25 हजार तक खर्च आता है।
चल रहा है पत्र व्यवहार
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. कौशलेंद्र सिंह का कहना है कि इस बाबत शासन को अवगत कराया जा चुका है। पत्र व्यवहार चल रहा है। शासन को निर्णय लेना है कि मशीन और स्टाफ कब आएगा।
दवा प्रयोगशाला में 27 महीने बाद भी जांच नहीं
मेडिकल कॉलेज स्थित खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विंग में करीब 27 महीने से दवाओं की जांच के लिए बनी प्रयोगशाला की बिल्डिंग तैयार है। बाहर ताला है और अंदर इसमें न तो उपकरण हैं और न ही स्टाफ।
16 नवंबर 2019 को तत्कालीन राज्यमंत्री डॉ. धर्म सिंह सैनी ने इसका लोकार्पण किया था। तब दावा किया गया था कि जल्द ही दवाओं की जांच शुरू हो जाएगी। यहां से दवाओं के सैंपल लखनऊ जाते हैं, जहां से रिपोर्ट आने में कई महीने लग जाते हैं। दवा के 100 से ज्यादा नमूनों की रिपोर्ट महीनों से अटकी है।