30 अप्रैल से 7 मई 1857
इस बीच मेरठ के कई हिस्सों में छोटी-मोटी आग लगने की घटनाएं हुई। कई सरकारी दफ्तरों के छप्पर जला दिए गए। अंग्रेज इसकी वजह गर्मी मानते रहे, जबकि यह क्रांति का एक बड़ा संकेत था।
6 से 8 मई 1857
कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया चली। 80 सिपाहियों को 10 साल, जबकि 5 सिपाहियों को पांच साल की सजा सुनाई गई। 9 मई परेड ग्राउंड में सभी सिपाहियों को इकट्ठा करके पहले तो उनसे असलहा छीने गए और फिर वर्दी उतरवाई गई। सभी को जंजीरों में जकड़कर जेल भेज दिया गया। बाजार में उन पर लोगों और नगरवधुओं के ताने पड़े तो उनका खून भी खौल उठा।
इतिहास में दर्ज हो गई 10 मई
रविवार का दिन था, अंग्रेज छुट्टी के मूड में थे। कोई बाजार में खरीदारी कर रहा था तो कोई चर्च में प्रार्थना करने गया था। तभी शाम करीब 5:30 बजे सदर बाजार से क्रांति की ज्वाला धधक उठी। पैदल सेना के परेड ग्राउंड में फायरिंग शुरू हो गई। अंग्रेज अफसरों को निशाना बनाया गया। 6:15 बजे तक दोनों जेल तोड़ दी गई।
भारतीय सिपाही विद्रोह कर चुके थे। अगले दो घंटे में छावनी इलाका जल उठा। शाम 7:30 बजे के आसपास ये सभी रिठानी गांव के निकट इकट्ठा हुए और दिल्ली कूच कर गए। अगले दिन सुबह ये नावों के बने पुल को पार कर यमुना किनारे लाल किला की प्राचीर तक पहुंचे। इधर रात के हमलों से संभलकर ब्रिटिश सैनिकों ने भी दिल्ली कूच किया, लेकिन तब तक क्रांति की ज्वाला धधक चुकी थी।