विधानसभा चुनाव में बढ़ गई थी कलह
विधानसभा चुनाव से पहले भाकियू नेता राजू अहलावत ने भाजपा का दामन थाम लिया था। किसान राजनीति के जानकारों को तभी से भाकियू में बिखराव का अंदेशा होने लगा था। इस दौरान किसान आंदोलन खत्म हुआ और विधानसभा चुनाव हुए। अंदरूनी कलह बढ़ती गई, जिसके बाद आखिरकार बागी हुए पदाधिकारियों ने नई पटकथा लिख दी।
भाकियू से अलग हुए राजेश चौहान, धर्मेंद्र मलिक, हरनाम सिंह, दिगंबर सिंह, अनिल तालान, मांगेराम त्यागी को राजू अहलावत का करीबी माना जा रहा है। अहलावत करीब 10 साल तक जिलाध्यक्ष रहे हैं। राजू अहलावत के भाजपा में पहुंचते ही भाकियू का कुनबा बिखर गया। भाजपा नेता राजू अहलावत कहना है कि भाकियू अब संगठन कम राजनीतिक दल ज्यादा नजर आती है।
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गुटबंदी में बनते रहे किसानों के अलग संगठन
भले ही किसानों के संगठन अराजनैतिक हों, लेकिन इनके अंदर भी पदाधिकारियों के बीच गुटबंदी उभरती रहती है। यह गुटबंदी इस हद तक उभरी कि किसान संगठन में दरार पड़ती रही। पदाधिकारियों ने भाकियू संगठन से टूटकर अलग संगठन बनाए। गुटबंदी के कारण बिजनौर जनपद में कई किसान संगठन चल रहे हैं।
कई साल पहले भाकियू संगठन से नाराज तत्कालीन जिलाध्यक्ष चौधरी राजेंद्र सिंह ने आजाद किसान यूनियन का गठन किया। वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और किसान संगठन चला रहे है। जनपद में भाकियू अंबावता के जिलाध्यक्ष शिवकुमार, भाकियू भानू के जिलाध्यक्ष नरेश कुमार, भाकियू लोकशक्ति के जिलाध्यक्ष वीरसिंह, भाकियू तोमर आदि संगठन जनपद में सक्रिय हैं। भाकियू के पूर्व जिलाध्यक्ष, युवा प्रदेशाध्यक्ष व मंडल अध्यक्ष चौधरी दिगंबर सिंह भी अपने समर्थकों के नए संगठन में शामिल हुए हैं। चौधरी दिगंबर सिंह ने बताया कि जनपद में संगठन, किसानों के हालात को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
राजनीतिक दबाव में बनाया गया दूसरा संगठन : टिकैत
मुजफ्फरनगर में भाकियू प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि विचारधारा में भिन्नता के कारण दूसरे लोग अलग हुए हैं। राजनीतिक दबाव में दूसरा संगठन बनाया गया। भाकियू की ताकत पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। करनाल में 18 मई को कार्यकारिणी की बैठक में अहम फैसले लिए जाएंगे। संगठन से अलग हुए लोगों की सूची भी जारी करेंगे। सरकार आंदोलन नहीं तोड़ सकी, लेकिन संगठन को तोड़ना शुरू कर दिया है।
रविवार को सरकुलर रोड स्थित आवास पर चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों ने कई लोगों को छोटे-छोटे गांवों से निकालकर बीकेयू में 30 साल तक बड़े-बड़े पदों पर बैठाया। 13 महीने जो लोग कृषि कानून को खराब बता रहे थे, अब वही अच्छा बताने लगे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा में भी 550 किसान संगठन है। हमारे पदाधिकारी गए हैं, जिन्हें मनाने की कोशिश की गई, लेकिन वह नहीं माने। अंगुली कटती है, दुख होता है। सब एक परिवार का हिस्सा रहे। अब किसान संगठन को खुद चलाएंगे। गांवों से पदाधिकारी निकाले जाएंगे और संगठन पहले से भी मजबूत चलेगा।
यह है दोनों संगठन में फर्क
भाकियू प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि हमारा संगठन भाकियू के नाम से पंजीकृत है। दूसरे संगठन के सामने अराजनैतिक लिखा गया है। उनका संगठन अलग है और हमारा अलग है।