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कोरोना ने छीनी जिले के चार लाख बुनकरों की रोजी रोटी

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मऊ। कोरोना संकट ने बुनकरों की रोजी रोटी छीन लिया है। कोरोना के चलते मऊ की साड़ियों की डिमांड महानगरों में काफी कम हो गई है। कोरोना की वजह से बाहर के व्यापारियों का मऊ आना काफी कम हो गया है। इस वजह से साड़ी निर्माता साड़ियों की बुनाई नहीं करा रहे हैं। जिससे बुनकरों के समक्ष आर्थिक तंगी आ गई है। जिले में लगभग चार लाख बुनकर मजदूर हैं। इनके परिवार की आजीविका एक मात्र बुनाई से मिलने वाली मजदूरी है। एक लूम पर औसतन एक दिन में केवल एक साड़ी की बुनाई हो पा रही है जिसकी मजदूरी सौ रुपये से लेकर तीन सौ रुपयों तक मिल रही है। कोरोना संकट से पूर्व इसका लगभग पौने दो गुना मजदूरी मिल जाती थी।
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मऊ जनपद में पावरलूम पर साड़ियों और लुंगियों की बुनाई करने वालों की संख्या बहुत काफी है। जिला मुख्यालय से लेकर कोपागंज, अदरी, घोसी, सिपाह इब्राहिमाबाद, वलीदपुर में बुनाई का काम बड़े पैमाने पर होता है। मऊ की बनी साड़ियों की डिमांड मुंबई, कोलकाता, झारखंड, आसाम, बिहार, छत्तीसगढ़ सहित देश के कई महानगरों में होती है। लेकिन कोरोना काल में महानगरों से साड़ियों की डिमांड काफी घट गई है या यूं कहें कि नाम मात्र रह गई है। बाहर से आर्डर न मिलने के कारण सेठों ने साडियों की बुनाई कराना कम कर दिया है।
जिला मुख्यालय सहित जिले के कई कसबों में पावरलूम पर साड़ियों पर बुनाई करने वाले बुनकर मजदूरों की संख्या लगभग चार लाख है। इन बुनकरों का परिवार साड़ियों की बुनाई से मिलने वाली मजदूरी से चलता है। पिछले लगभग डेढ़ साल से अधिक समय से कोरोना संकट से साड़ियों की बिक्री काफी कम हो गई है। साड़ी निर्माताओं का कहना है कि बाहर के व्यापारियों से साड़ियों के आर्डर नहीं मिल रहे हैं। इसलिए साड़ियां बुनवाने से माल डंप होगा। उधर साड़ियों की बुनाई का काम नहीं मिलने से बुनकर बेरोजगार हो गए हैं।
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साड़ी बुनाई के लिए नहीं मिल रहा माल
शहर के कासिम पोखरी मुहल्ला निवासी बुनकर मुहम्मद आमिर का कहना है कि बुनाई का काम नहीं मिल रहा है। लगभग डेढ़ साल से साड़ी बुनाई के लिए माल नहीं मिल रहा है। साड़ी बुनाई से मिलने वाली मजदूरी से ही बुनकरों का परिवार चलता है। बुनकर नेता अबू बकर अंसारी कहते हैं कि वर्तमान समय में बुनकरों को काम न मिलने से उनके समक्ष फांकाकशी की नौबत आ गई है। इसी प्रकार बुनकर फोरम के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व पालिकाध्यक्ष अरशद जमाल का कहना है कि इस समय बुनकर सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। उनको परिवार का गुजर बसर करना भारी मुश्किल हो रहा है। शहर के छित्तनपुरा मुहल्ला निवासी बुनकर रेयाज अहमद का कहना है कि यूं तो कोरोना से पहले से ही बुनाई का काम काफी मंदा चल रहा था। लेकिन रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है। अब तो मजदूरी के लिए माल नहीं नहीं मिलता है। इसलिए काफी तंगहाली झेलनी पड़ रही है।
बाढ़ के चलते ऑर्डर नहीं मिले
शहर के पहाड़प़ुरा मुहल्ला निवासी साड़ी कारोबारी मुहम्मद इस्लाम का कहना है कि कोरोना संकट और देश के कई हिस्सों में आई भारी बाढ़ के चलते साड़ियों के आर्डर मिलने ठप हो गए हैं। इसलिए साड़ियों की बुनाई कम करा दी गई है। मलिक ताहिरपुरा मुहल्ला निवासी साड़ी कारोबारी सरफराज अहमद बताते हैं कि कोरोना की वजह से साड़ियों की मांग काफी कम हो गई थी। इधर एक महीने से अधिक समय से देश के महानगरों में आई बाढ़ ने हालत और बिगाड़ दी है। बाहर से डिमांड घट जाने की वजह से साड़ियों की बुनाई कम करानी पड़ रही है।
तीन तरह के होते हैं बुनकर
बुनकरों की तीन प्रकार की श्रेणियां हैं। पहला वह, जो केवल मजदूर बुनकर होते हैं जो दूसरों के लूम पर मजदूरी पर बुनाई करते हैं। दूसरे वह बुनकर होते हैं जिनके घरों में ही लूम लगे होते हैं और स्वयं मजदूरी करते हैं। तीसरे, मास्टर वीवर होते हैं जो कई बुनकरों को काम पर रखकर मजदूरी देते हैं।
एक दिन तैयार होती है एक साड़ी
एक लूम पर एक दिन में औसतन एक साड़ी तैयार होती है। जिसकी मजदूरी सौ रुपये से लेकर तीन सौ रुपयों तक होती है। लेकिन जो मजदूर दूसरे के लूम पर मजदूरी करता है उसे इसकी आधी मजदूरी मिलती है। वर्तमान में डिमांड ने होने से औसतन एक साड़ी का आर्डर एक बुनकर पा रहा है। मास्टर वीवर की आमदनी अपेक्षाकृत कुछ अच्छी हो जाती है। जिनके घरों में ही लूम लगे होते हैं उसी आमदनी में उनका बिजली का बिल और मेंटिनेंस खर्च भी देना होता है।
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