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सिहरन के साथ जोश भी दिलाती है सामूहिक फांसी की दास्तां

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उपेक्षित पड़ा शहीद स्थल हवेली दरवाजा मैदान - फोटो : MAHOBA
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महोबा। कजली महोत्सव के तीसरे दिन शहर के हवेली दरवाजा मैदान में शहीदों की याद में लगने वाला मेला लगातार दूसरे वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते स्थगित हो गया। वर्ष 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने 16 क्रांतिवीरों में इसी हवेली दरवाजा मैदान में इमली के पेड़ पर सामूहिक फांसी दी थी। सामूहिक फांसी की यह दास्तां सिहरन के साथ जोश भी दिलाती है लेकिन शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते आजतक इस मैदान में शहीद स्थल नहीं बन सका।
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वीरभूमि के नाम से विख्यात महोबा में बुंदेलों ने हमेशा वीरता का परिचय दिया। देश की आजादी में यहां के रणबाकुुरों का अहम योगदान रहा। अंग्रेेजों से लोहा लेकर तमाम बुंदेलों ने अपनी जान न्योछावर कर दी। वर्ष 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान जैसे ही मेरठ में हुई घटना की जानकारी आई तो बुंदेलों ने आंदोलन शुरु कर दिया। तब तत्कालीन कलेक्टर जनरल व्हिटलाक बर्बरता पर उतर आया। बुंदेलखंड में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एक सैकड़ा से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें से 16 देेशभक्तों को फांसी की सजा सुनाई गई ताकि अन्य लोग बगावत न कर सके। फांसी की सजा का अंग्रेजों ने प्रचार-प्रसार भी किया। तय तिथि पर ज्योराहा निवासी कल्लू, भवानी समेत सभी 16 क्रांतिकारियों को हवेली दरवाजा मैदान में लगे इमली के पेड़ पर सामूहिक फांसी दी गई लेकिन सामूहिक फांसी के बाद अन्य क्रांतिवीरों का जोश घटने के बजाय और बढ़ गया और उन्होंने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। हर साल रक्षाबंधन के दूसरे दिन से शहर में लगने वाले ऐतिहासिक कजली मेले की शुरुआत इसी मैदान से होती है और तीसरे दिन यहां मेला लगता है। इस बार 25 अगस्त को शहीद स्थल हवेली दरवाजा पर लगने वाला मेला भी कोरोना के चलते स्थगित हो गया।
जिस हवेली दरवाजा शहीद मैदान में सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान 16 क्रांतिवीरों को फांसी की सजा दी गई थी। उस मैदान में अब पूरे इलाके का कूड़ा फेंका जाता है। शहीदों की स्मृति में यहां गुदड़ी मेले का आयोजन होता है। स्मारक बनाए जाने के लिए बुंदेली समाज ने दो अक्टूबर 2019 को आमरण अनशन किया था। प्रशासन ने तीन माह के अंदर स्मारक बनवाने का आश्वासन दिया था। इसके लिए पालिका प्रशासन ने टेेंडर निकालकर 32 लाख रुपये की धनराशि भी आवंटित कर दी थी लेकिन आज तक शहीद स्मारक नहीं बन सका।
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अंग्रेजी हुकूमत के दौरान जिन 16 क्रांतिवीरों को फांसी दी गई थी। वह सभी यहां आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजी शासक का मानना था कि इनको सामूहिक सजा दी जाए तो अन्य आंदोलनकारी डर जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ है और बुंदेलों ने डटकर मुकाबला कर अंग्रेजों को खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई। शहीद स्थल न बनने का मलाल है। प्रशासन को चाहिए कि शहीदों की याद में यहां स्मारक का निर्माण कराया जाए ताकि युवा पुराने इतिहास से परिचित हो सके।
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डॉ. एलसी अनुरागी, इतिहासकार
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