पथरीले रास्ते से पांडव वन जाने को मजबूर पर्यटक
ङोंगराखुर्द/ललितपुर। तहसील पाली के नाराहट क्षेत्र में ग्राम पारौल के पास विंध्याचल पर्वत की श्रृंखला पर स्थित सिद्ध क्षेत्र तपो भूमि पांङव वन पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां तक पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर जंगल से होकर ऊबड़-खाबड़, कंकरीला, पथरीला रास्ता जाता है। पर्यटकों के पहुंचने के लिए बरसात के दिनों में यह रास्ता कीचड़ युक्त हो जाता है जिससे यहां वाहन चलाना तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। रास्ते में यहां तक पहुंचने के बाद चारों ओर विशाल नदी गुफाएं और हरा-भरा जंगल देखने का असली आनंद बरसात में ही आता है।
प्राकृतिक प्राचीन स्थल मनोहारी व सुहावनी छटा बिखेरता
पांडवों को जब एक वर्ष का अज्ञातवास दिया गया तो पांचों पांडवों ने वनवास काल में विंध्याचल पर्वतों पर बिताया था, इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब आधुनिक युग में यहां तक पहुंचना मुश्किल होता है तो उस दौर में स्थिति क्या रही होगी। यह स्थान आज तपो भूमि पांडव के नाम से जाना जाता है। जामनी नदी की गहराई लगभग दो सौ फीट है, जिसमें पांडवों का स्थान बीचों-बीच पत्थर की बड़ी चट्टानों व आम के पेड़ के पास है। यहां पांचों पांडव द्रोपदी सहित पिंडीनुमा मूर्तियां भी स्थित हैं। इन पिंडियों के पास जल कुंड स्थित है, यहां पर जल श्रोत साल भर कभी नहीं सूखता, लेकिन जेठ मास की अमावस्या पर ढाई दिन के बाद सूख जाता है। पर्वत की श्रृंखला पर स्थित प्राचीन सूरजमुखी हनुमानजी मंदिर है, जिसकी काफी मान्यता है कि अहरावण को अपने चरणों में रखे हुए है। यहीं पांडव द्रोपदी सहित तपस्या करने लगे।
मान्यतानुसार पांडवों ने खेला था नृत्य शैरा
पांडवों के पद चिन्ह पर्वत श्रृंखला से काफी गहराई में जामनी नदी में पत्थरों पर दर्शित हैं। लोगों द्वारा बताया गया कि पहले पत्थर मोम जैसा होता था, जिससे पशु-पक्षियों व जानवरों और इंसानों के पैरों के चिन्ह पत्थरों पर अंकित हैं, जो आज भी दर्शित होते हैं जानकारी के मुताबिक पांडव वन की गुफाओं में भित्ती चित्र बने हुए हैं, जो अनुमानित सैकड़ों साल पुराने हैं। गुफाओं की श्रृंखलाओं में ऐसे चित्र बनें हिरन द्रोपदी मान्यता है कि पांडव वन वनवास के समय रहे उनसे जुड़े अभिषेक कुछ इसके प्रमाण पत्थरों में इनके चित्र बने हुए हैं।
सैकड़ों वर्षों से इस प्राचीन स्थल पांडव वन में मकर संक्रांति पर सात दिवसीय भव्य विशाल मेले का आयोजन होता चला आ रहा है। मेले में हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं, जबकि वर्तमान में इस मेले के आयोजन की सारी व्यवस्थाएं प्रशासनिक देख रेख में ग्राम पारोल की मेला समिति द्वारा कराया जाता है। हालांकि मेले के समय ग्राम प्रधान एवं पारौल के लोगों द्वारा कच्चे रास्ते पर मिट्टी ङलवाकर सङ़क सुधारने का प्रयास किया है, जिससे सैलानियों को पहुंचने में दिक्कत न हो। ग्रामीणों द्वारा हर साल मिट्टी ङलवाई जाती है लेकिन बरसात में पूरा रास्ता खराब हो जाता है।
अखिलेश यादव।
तत्कालीन जिलाधिकारी योगेश कुमार शुक्ल के निर्देश पर दो साल पहले पांडव वन तक जाने के लिए पांच किलोमीटर की दूरी तक का स्टीमेट 2.75 लाख रुपये जिला कार्य योजना में तीन बार बनाकर भेजा गया है। लेकिन धनराशि का इंतजाम अभी तक नहीं हुआ। पांडव वन रास्ता खराब होने की बजाय यहां आने वाले पर्यटकों को पहुंचने के लिए दिक्कतें आती हैं, इस ओर शासन प्रशासन ध्यान देना चाहिए। -अखिलेश यादव, ग्रामीण।
महेंद्र पंडित।
पांडव वन सड़क जब भी बने, पक्की बनना चाहिए सीमेंट से। जो ज्यादा दिनों तक चल सके और मजबूत हो, क्योंकि पानी का बहाव ज्यादा है, इसलिए कच्ची सड़क बरसात में मिट जाएगी।
-महेंद्र पंडित शास्त्री।