फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कजलिया का विसर्जन कर, एक-दूसरे को गले मिलकर दी बधाई

विज्ञापन
नीलकंठेश्वर मंदिर पाली में भगवान नीलकंठ को कजलियां अर्पित करता श्रद्घालु। - फोटो : LALITPUR
विज्ञापन
पाली(ललितपुर)। नगर पंचायत पाली में प्राचीन परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन पर्व के दूसरे दिन भुजरियां, कजलियों का त्योहार नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में सोमवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। नगर व ग्रामीण क्षेत्रो में सामूहिक रूप से भुजरियां ले जाकर देव स्थानों व नदी, तालाब व कुओं में इनका विसर्जन विधि-विधान के साथ किया गया। धूमधाम से कजलियों का त्योहार मनाया गया।
विज्ञापन

इस मौके पर लोगों ने एक दूसरे को कजरियां भुजरिया देकर और गले मिलकर बधाईयां दीं।
नगर व ग्रामीण क्षेत्रो में सामूहिक रूप से भुजरियां ले जाकर नदी व तालाब व कुओं में इनका विसर्जन विधि-विधान के साथ किया गया। सुबह से इस पर्व को लेकर उल्लास प्रारंभ हो गया था और भुजरियों को एक जगह एकत्रित कर पूरे परिवार के साथ बैठकर लोगों ने पूजा-अर्चना की। सोमवार को भुजरियों को कुओं,ताल-तलैयों पर जाकर निकालकर सर्व प्रथम भगवान को भेंट किया गया। इसके बाद लोगों ने एक दूसरे से भुजरियां बदलकर अपने गिले-सिकवे भुलाकर गले मिले। वहीं, चौरसिया समाज पाली द्वारा अवधविहारी मंदिर पर भुजरिया मिलन समारोह का आयोजन भी किया गया।
----------
यह है भुजरियां पर्व
भुजरियां का पर्व सौभाग्य और भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है। पारंपरिक त्योहार प्रकृति के स्वागत और उसकी उपासना से जुड़ा है। माना जाता है कि मैहर में विराजित मां शारदा देवी के वरदान से अमर हुए आल्हा-ऊदल की बहन से भी इस पर्व का गहरा संबंध है। आल्हा की मुंह बोली बहन चंदा के सुरक्षित बचने पर लोगों ने एक-दूसरे को हरित तृण देकर खुशियां मनाईं थीं। हालांकि, यह पर्व भारत की कृषि आधारित परंपरा से जुड़ा है । इसमें बारिश के बाद खेतों में लहलहाती खरीफ की फसल से आनंदित किसान एक-दूसरे को हरित तृण यानी कजलियां भेंट करके सुख और सौभाग्य की कामना करते हैं। यही कजलियां सबसे पहले कुलदेवता व अन्य देवताओं को अर्पित कर सुख-सौभाग्य की कामना की जाती है। एक-दूसरे का सुख-दुख बांटकर जीवन की खुशहाली की कामना करते हैं।
विज्ञापन

---------
ऐसे बोई जाती हैं कजलियां
कजलियां पर्व को लेकर लोग नागपंचमी या फिर किसी अन्य निर्धारित तिथि पर अपने घर में बांस की टोकनियों या महुआ के पत्तों के बड़े से दौनों में मिट्टी व गोबर की खाद भरकर उसमें गेहूं के दाने डालते हैं। इनकी रोज सिंचाई व देखरेख की जाती है। रक्षा बंधन तक ये दाने लहलहाते कजलियों में तब्दील हो जाते हैं। इन हरित तृणों को कजलियां कहा जाता है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाएं व पुरुष इन कजलियों को ले जाकर जलाशयों में पहुंचती हैं। मंगल गीतों के साथ कजलियों को तोड़ा जाता है। कुछ कजलियां विसर्जित कर दी जाती हैं। कुछ हिस्सा वापस घरों में लाया जाता है। इसके बाद शुरू हुआ एक दूसरे को कजलियों को अदान-प्रदान करने का सिलसिला जो देर रात तक चलता रहा। नगर के आसपास ग्रामीण क्षेत्रों और नगर के लोगों ने नदियों, तालाबों और पोखरों में कजलियों को प्रवाहित कर भगवान को चढ़ाने के बाद एक दूसरे को कजलियां की शाखा देते हुए हर जन्म में इस तरह के मित्र, सखा, बंधु, परिवार और ग्रामीण मिलने की कामना की तथा लोगों को घर में बुलाकर बैठाकर कजलियों का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। आल्हा ऊदल के विजय उत्सव का प्रतीक कजली उत्सव विंध्य क्षेत्र में लगातार रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है। बताया जाता है कि यह त्योहार उन्हीं के याद में लगातार मनाया जा रहा है। आल्हाखंड के भुजरियों की लड़ाई में इस प्रसंग का संपूर्ण वर्णन भी किया गया है। इसलिए इस त्योहार को एक दूसरे के साथ मिलकर विजय उत्सव के रूप में आज भी मनाया जा रहा है। नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया गया।

पाली में कजलियां देकर एक दूसरे से गले मिलते लोग।- फोटो : LALITPUR

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें